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वास्कोडिगामा ने स्वयं से भारत नही खोजा

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 अंग्रेजों ने एक भ्रम और व्याप्त किया कि वास्कोडिगामा ने समुद्र मार्ग से भारत आने का मार्ग खोजा। यह सत्य है कि वास्कोडिगामा भारत आया था, पर वह कैसे आया इसके यथार्थ को हम जानेंगे तो स्पष्ट होगा कि वास्तविकता क्या है? प्रसिद्ध पुरातत्ववेता पद्मश्री डा. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने बताया कि मैं अभ्यास के लिए इंग्लैण्ड गया था। वहां एक संग्रहालय में मुझे वास्कोडिगामा की डायरी के संदर्भ में बताया गया। इस डायरी में वास्कोडिगामा ने वह भारत कैसे आया, इसका वर्णन किया है। वह लिखता है, जब उसका जहाज अफ्रीका में जंजीबार के निकट आया तो मेरे से तीन गुना बड़ा जहाज मैंने देखा । तब एक अफ्रीकन दुभाषिया लेकर वह उस जहाज के मालिक से मिलने गया। जहाज का मालिक चंदन नाम का एक गुजराती व्यापारी था, जो भारतवर्ष से चीड़ व सागवान की लकड़ी तथा मसाले लेकर वहां गया था और उसके बदले में हीरे लेकर वह कोचीन के बंदरगाह आकार व्यापार करता था। वास्कोडिगामा जब उससे मिलने पहुंचा तब वह चंदन नाम का व्यापारी सामान्य वेष में एक खटिया पर बैठा था। उस व्यापारी ने वास्कोडिगामा से पूछा, कहां जा रहे हो? वास्कोडिगामा ने कहा- भारत...

इस्लाम का वास्तविक पुरातन यतार्थ

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प्राचीन कालीन अरबों के प्रधान तीर्थ मक्का का भी बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। शायर-उल-ओकुल की भूमिका में मक्का में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित होने वाले वार्षिक मेले "ओकाज़" का वर्णन है। स्मरण रहे, वर्तमान प्रचलित वार्षिक हज-यात्रा भी कोई इस्लामी विशेषता नहीं है, अपितु प्रागैस्लामी "ओकाज" (धार्मिक मेला) का ही परिवर्तित रूप है। इस मेले का मुख्य आकर्षण मक्का के मुख्य मन्दिर मक्केश्वर महादेव (अब ‘अल-मस्जि़द-अल-हरम') के प्रांगण में होने वाला एक सारस्वत कवि सम्मेलन था, जिसमें सम्पूर्ण अर्वस्थान से आमन्त्रित कवि काव्य पाठ करते थे। ये कविताएँ पुरस्कृत होती थीं। सर्वप्रथम कवि की कविता को स्वर्ण पत्र पर उत्कीर्ण कर मक्केश्वर महादेव मन्दिर के परमपावन गर्भगृह में लटकाया जाता था। द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त कविताओं को क्रमशः ऊँट और भेड़/बकरी के चमड़े पर निरेखित कर मन्दिर की बाहरी दीवारों पर लटकाया जाता था। इस प्रकार अरबी साहित्य का अमूल्य संग्रह हजारों वर्षों से मन्दिर में एकत्र होता चला आ रहा था। यह ज्ञात नहीं है कि यह प्रथा कब प्रारम्भ हुई थी,...

◆||#चण्ड_अशोक||◆

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"राजकुमार, महामात्य राधगुप्त का संदेश है, तत्काल ही पाटलिपुत्र पहुंचिए।", व्यग्रता के साथ एक गुप्तचर ने अशोक को सूचना दी। युवक ने बिना किसी औपचारिकता के जब सूचना अशोक को दी तभी अशोक को स्थिति की गम्भीरता का भान हो गया था। मौर्य साम्राज्य के ध्वज के तले हिन्दकुश की जमीन आज यवनो के लिए यदि दीवार थी तो उसका कारण था महान चाणक्य और उसका शिष्य महान चंद्रगुप्त। अशोक जानता था गुप्तचर प्रणाली का जो तंत्र "कौटिल्य" बना गए है उसने न केवल "सिकन्दर" बल्कि "पुरु" और "धनानन्द" की भी नींव हिला दी थी। इस समय अशोक को तुरन्त ही राजधानी पहुंचना था। अशोक को रस्ते में समाचार प्राप्त हो चुका था कि "सुषीम" को खबर नही भिजवाई गई है, यदि फिर भी उसके विश्वासपात्र खबर भिजवा भी दे तो "तक्षशिला" से पाटलिपुत्र आने में बहुत समय लगेगा। "बिन्दुसार" के प्रति अशोक में हृदय में अब कोई सम्मान बाकी नही रह गया था, इसकी वजह भी स्वयं बिंदुसार ही थे। बचपन से आज तक बिंदुसार "सुषीम" के मोह में बंधे यह नही देख पाए थे कि "अशोक" ज्यादा...

◆||#सुर_संगीत||◆

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"अकबर" के दरबार मे कला प्रेमियों का जमावड़ा रहता था, 9 रत्नों में एक थे तानसेन। "तानसेन" "गुरु हरिदास" के शिष्य थे, वही "गुरु हरिदास" जिन्होंने अपनी सुरों की साधना से बिहारी जी को पुनः प्रकट कर दिया था और उन्हें विवश किया वृंदावन के निधिवन में रहने को। "अकबर" एक दिन "तानसेन" का संगीत सुनकर इतने मंत्रमुग्ध हुए की उन्होंने आगरा में यह घोषणा करवग दी की "तानसेन" के अतिरिक्त कोई भी गाना नही गायेगा, अन्यथा उसे "तानसेन" के लिए चुनौती समझा जाएगा और यदि उसने "तानसेन" को नही हराया तो उसे मृत्यु दंड दे दिया जाएगा। एक दिन साधुओं की एक टोली सुबह सुबह भजन गाती बांके बिहारी के दर्शनों के लिए जा रही थी। आगरा के निकट से जब वे लोग गुजरे तो सिपाहियों ने उन साधुओं को पकड़ लिया और कहा,"क्या, तुम्हें मृत्यु का भय नही है, जो गाना गा रहे हो.? चलो अब बादशाह के दरबार में।" साधु घबराए मगर क्या करें जाना तो था ही सो चल पड़े दरबार की ओर। अकबर ने पूछा, "इनको दरबार मे क्यों लाया गया ?" सिपाहियों ने कारण बताया त...

मौर्य, नन्द और गुप्त सबसे अधिक शक्तिशाली राजवंश उच्च जातियों से नहीं थे ...

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चलिए अब राजनीति से थोड़ा आगे बढ़ते हुए राष्ट्रनीति पर ध्यान देते हैं । हमारा संविधान बताता है कि सभी भारतीय एक बराबर हैं और फिर उसी में थोड़ा आगे जा कर दलित और अल्प-संख्यक जैसे शब्दों का प्रयोग हो जाता है । अब साधारण शब्दों में कहूँ तो हमारा संविधान ही हमें एक  बराबर नहीं मानता ।  जब आपने कह दिया कि सभी एक बराबर हैं तो फिर अलग से दलित और अल्प-संख्यक शब्द लिखने की आवश्यकता ही क्या थी ? मतलब आपने उसके पहले जो कुछ लिखा है आपको खुद में उस पर विश्वास नहीं है कि उसका पालन होगा । यही ना ? अच्छा ! ये जो दलित शब्द है देखने पर बड़ा ही सामाजिक शब्द दिखाई पड़ता है लेकिन वास्तव में ये पूर्णतया राजनीतिक शब्द है ।  भारत की जाति व्यवस्था के विषय में एक टिप्पणी पढ़ी थी मैंने । किसी विदेशी की टिप्पणी थी । कि ‘भारत में नीच से नीच जाति भी अपने से नीच जाति खोज लेती है’ ।  व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि ना तो कोई जाति नीची होती है और ना कोई ऊंची । सबका अपना-अपना काम है । और यही जाति-व्यवस्था के मूल में था । एक उदाहरण से समझते हैं । मान लीजिए आपके क्षेत्र में नाली की सफाई करने वाले कर्मचारियो...

सरकारी नौकरियाँ से दलितों का उत्थान .... ?

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दलित शब्द के साथ ही एक और शब्द आ जाता है और वो है आरक्षण ! पिछड़े हुए लोगों को हमेशा के लिए पिछड़ा बना देने वाली साजिश ! मैं जानती हूँ आपको मेरी इस बात से गम्भीर आपत्ति होगी । इसीलिए मैं चाहती हूँ कि एक बार आप इस आरक्षण का ध्यान से विश्लेषण करें । एक उदाहरण से इस मुद्दे को शुरू करते हैं । मैं जब कॉलेज में पहुंची तो कॉलेज प्रवेश परीक्षा में मेरे अंक थे 606 / 900 । मेरे साथ मेरे ही क्लास में एक और लड़का था उसके प्रवेश परीक्षा में कुल अंक थे 50 / 900 । जबकि उसी दौर में सामान्य श्रेणी के हजारों छात्र ऐसे रहे होंगे जिन्होंने 50 से कहीं अधिक अंक लाए लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिला । मैं जानती हूँ कि अभी आप इमोश्नल बातें करेंगे कि दलितों पर हजारों वर्षों से अत्याचार हो रहे हैं आज भी हो रहे हैं । बहुत सारी बातें ! मैं एकदम सहमत हूँ कि आप पर बहुत अत्याचार हुआ है । आज भी हो रहा है । सब मान लिया । यह भी मान लिया कि उसे ऐसी कोई कोचिंग की सुविधा नहीं मिली जो दूसरे बच्चों को मिली । लेकिन ! क्या आपको यह नहीं लगता कि यह अयोग्यता पर योग्यता का ठप्पा लगा देने जैसा है ? क्या आपको वाकई यह लगता है कि 900 में 50...

डोले शाह के चूहे या अभिशप्त

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# डोले_शाह_के_चूहे  - पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गुजरात या गुजरावाला जिले में पीर डोले शाह की मज़ार है। डोले शाह औरंज़ेब के ज़माने में यहाँ रहा करते थे। पीर साहब का दावा था कि वो बाँझ औरतों को औलाद दे सकते हैं परन्तु उनकी शर्त ये थी कि औरतें अपना पहला बच्चा उनकी दरगाह पर पीर की सेवा के लिए छोड़ जाएंगी। ये परंपरा आज तक चली आ रही है और एक अनुमान के मुताबिक़ पिछले तीन सौ साल में एक लाख से ज़्यादा बच्चे दरगाह की नज़र किये गए। ये बच्चे जो दरगाह पर पल कर बड़े होते थे, इनकी खासियत ये थी की ये अपनी उम्र के हिसाब से शारीरिक तौर पर तो लम्बे-चौड़े, हष्ट-पुष्ट हो जाते थे, परन्तु इनका सर एक-दो साल के बच्चे जितना बड़ा ही रहता था। साथ में ये मंदबुद्धि भी होते थे और दरगाह इनसे भीख मंगवा कर अपनी कमाई करती थी। इसका कारण यह था की यहाँ छोड़े गए साल-दो-साल के मासूम बच्चों को इसी उम्र से सर पर एक लोहे का हेलमेट पहना कर कस दिया जाता था। ये लोहे की टोपी सालों तक बंधी रहती थी। इससे इन बच्चों के सर के बनावट उतनी ही रह जाती थी और साथ में इनका मानसिक विकास भी रुक जाता था। इनको "चूहों" का नाम दिया जाता था और इन्ह...

अमेरिका की खोज जैंग और कोलम्बसन से भी पहले नॉर्स या वाइकिंग नॉर्स या वाइकिंग से पहले आयरलैंड के एक ईसाई सन्त ब्रेंडम एम्बोर्ट की

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अमेरिका का इतिहास क्रिस्टोफर कोलम्बस के बिना अधूरा है...                     क्रिस्टोफर कोलम्बस को ही अमेरिका को खोजने का श्रेय दिया जाता है... किसी जगह को खोजने से तात्पर्य होता है उस जगह तक पहुचने का रास्ता खोजना... प्राचीन यूरोपिन्स को एशिया, यूरोप और अफ्रीका महाद्वीप के अलावा किसी और द्वीप के होने का ज्ञान नही था... कोलम्बस यूरोप से भारत जाने वाला समुद्री रास्ता खोजने की मुहिम पर निकले थे लेकिन गलत दिशा का चुनाव करने की वजह से वो अमेरिकी उपमहाद्वीप पहुँच गए... इतिहास की किताबों में ऐसी भी कहा नियाँ लिखी है की ये गलती उनसे किसी अज्ञात शक्ति ने करवाई थी... एक कहानी कहती है कि वो आसमान में दिखने वाली एक रोशनी का पीछा करते हुए अमेरिका पहुँच गए थे... 1492 से 1502 के बीच कोलम्बस ने अमेरिका की चार यात्राएं की... लेकिन आपको ये जानकारी हैरानी हो सकती है कि कोलम्बस अमेरिका पहुचने वाले पहले यूरोपियन नहीं थे... कोलम्बस से लगभग सत्तर साल पहले चाइना की एक घुमन्तु जनजाति के जैंग और उनके कुछ साथियों के अमरीका पहुँचने के सबूत मौजूद है... चाइना म...

शिया और सुन्नी

  मौहम्मद - जहर से मरा फ़ातिमा बी ( मौहम्मद की बेटी )— चाकु से हत्या अली ( मौहमम्द का दामाद ) -नमाज पढ़ते मार दिया गया हसन ( मौहम्मद के बड़ा नाती ) - जहर देकर मार दिया गया हुसैन ( मौहम्मद के छोटा नाती ) — कर्बला के मैदान में भूखा प्यासा मार दिया गया ! मारने वाले कौन थें ? सब के सब मुसलमान ही थे । आज भी शिया और सुन्नी के नाम पर क़त्लेआम मचाया हुआ हैं । यही इस्लाम पहचान लो हिन्दुओ ।

विश्व के पहले शल्य चिकित्सक - आचार्य सुश्रुत

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विश्व के पहले शल्य चिकित्सक - आचार्य सुश्रुत || शल्य चिकित्सा के जनक: सुश्रुत सुश्रुत प्राचीन भारत के महान चिकित्साशास्त्री एवं शल्यचिकित्सक थे। उनको शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है।  शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के पितामह और 'सुश्रुत संहिता' के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में काशी में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की। सुश्रुत संहिता को भारतीय चिकित्सा पद्धति में विशेष स्थान प्राप्त है। (सुश्रुत संहिता में सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र कहा है। विश्वामित्र से कौन से विश्वामित्र अभिप्रेत हैं, यह स्पष्ट नहीं। सुश्रुत ने काशीपति दिवोदास से शल्यतंत्र का उपदेश प्राप्त किया था। काशीपति दिवोदास का समय ईसा पूर्व की दूसरी या तीसरी शती संभावित है। सुश्रुत के सहपाठी औपधेनव, वैतरणी आदि अनेक छात्र थे सुश्रुत का नाम नावनीतक में भी आता है अष्टांगसंग्रह में सुश्रुत का जो मत उद्धृत किया गया है;।। वह मत सुश्रुत संहिता में नहीं मिलता, इससे अनुमान होता है कि सुश्रुत संहिता के सिवाय दूसरी भी कोई संहिता सुश्रुत के नाम से प्रसिद्ध थी सुश्रुत के नाम पर आयुर्वेद भी प...

रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान के प्रणेता - नागार्जुन

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रसायन-धातु कर्म विज्ञान के प्रणेता - नागार्जुन। रसायन विज्ञान और सुपर धातुशोधन के जादूगर - नागार्जुन सनातन कालीन विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में रसायन एवं धातु कर्म विज्ञान के सन्दर्भ में नागार्जुन का नाम अमर है ... ये महान गुणों के धनी रसायनविज्ञ इतने प्रतिभाशाली थे की इन्होने विभिन्न धातुओं को सोने (गोल्ड) में बदलने की विधि का वर्णन किया था। एवं इसका सफलतापूर्वक प्रदर्शन भी किया था। इनकी जन्म तिथि एवं जन्मस्थान के विषय में अलग-अलग मत हैं। एक मत के अनुसार इनका जन्म द्वितीय शताब्दी में हुआ था। अन्य मतानुसार नागार्जुन का जन्म सन् 9 31 में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था, रसायन शास्त्र एक प्रयोगात्मक विज्ञान है। खनिजों, पौधों, कृषिधान्य आदि के द्वारा विविध वस्तुओं का उत्पादन, विभिन्न धातुओं का निर्माण व परस्पर परिवर्तन तथा स्वास्थ्य की दृष्टि में आवश्यक औषधियों का निर्माण इसके द्वारा होता है। नागार्जुन ने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर बहुत शोध कार्य किया। रसायन शास्त्र पर इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें 'रस रत्नाकर' और 'रसेन्द्र मंगल' बहुत प्रसिद...

महर्षि पाणिनि

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महर्षि पाणिनि - महर्षि पाणिनी महर्षि पाणिनि के प्राचीन प्रोग्रामिंग बारे में बताने पूर्व में आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग किस प्रकार कार्य करती है इसके बारे में कुछ बताना चाहूँगी  आज की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाएँ जैसे सी, सी ++, जावा आदि में प्रोग्रामिंग हाई लेवल लैंग्वेज (उच्च स्तर की भाषा) में लिखे जाते है जो अंग्रेजी के सामान ही होती है | इसे कंप्यूटर की गणना सम्बन्धी व्याख्या (संगणना के सिद्धांत) जिसमे प्रोग्रामिंग के सिंटेक्स आदि का वर्णन होता है, के द्वारा लो लेवल लैंग्वेज (कम स्तर की भाषा) जो विशेष प्रकार का कोड होता है जिसे न्यूमोनिक कहा जाता है जैसे जोड़ के लिए ADD, गुना के लिए एमयूएल आदि में परिवर्तित किये जाते है | तथा इस प्रकार प्राप्त कोड को प्रोसेसर द्वारा द्विआधारी भाषा (बाइनरी भाषा: 0101) में परिवर्तित कर क्रियान्वित किया जाता है | संगणना पर की इस प्रकार पूरा कंप्यूटर जगत थ्योरी निर्भर करता है | इसी संगणना पर महर्षि पाणिनि (लगभग 500 ई पू) ने एक पूरा ग्रन्थ लिखा था महर्षि पाणिनि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े व्याकरण विज्ञानी थे | इनका जन्म उत्तर पश्चिम भारत के गांधार मे...

भगवान शिव के 2 नहीं 6 पुत्र थे॥

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हम सभी भगवान् शिव और पार्वती के दो पुत्र कार्तिक और गणेश की ही कथा सुनते आये हैं।  लेकिन शिव और पार्वती के विवाह और उनसे होने वाले पुत्र के पीछे भी रोचक कहानी हैं।  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान् विष्णु का विवाह ब्रह्म देव के पुत्र भृगु की पुत्री लक्ष्मी से हुआ था. वहीँ ब्रह्मा के दुसरे पुत्र दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान् शिव से हुआ था. लेकिन सती ने आग में कूद कर स्वयं को भस्म कर लिया था।  तो सवाल ये है कि शिव के पुत्र कैसे हुए? सती की मृत्यु के बाद सती ने अपना दूसरा जन्म पर्वतराज हिमालय के यहाँ उमा के रूप में लिया था, जिससे भगवान शिव का विवाह हुआ और हिमालय की पुत्री उमा ही ‘पार्वती’ के नाम से जानी गयी. शिव पार्वती के विवाह के बाद उनका गृहस्थ जीवन शुरू हुआ और उन्हें पुत्र प्राप्त हुए।  1. गणेश- भगवान् गणेश के जन्म के पीछे की एक कहानी तो हम सब ने सुनी हैं कि माता पार्वती ने अपने उपटन और चन्दन के मिश्रण से गणेश की उत्पत्ति की और उसके बाद स्नान करने गयी थी।  माता पार्वती ने गणेश को यह आदेश दिया था, कि स्नान करते तक वह किसी को घर में प्रवेश न करने दे. कुछ दे...

सुआटा या नौरत या टेसू और झैंझी या झाँझी बुन्देलखण्डी लोक सांस्कृतिक परम्परा

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बुन्देलखण्ड में कुँवारी लड़कियों द्वारा खेला जाने वाला सुआटा अब लुप्त होता जा रहा हैं.टेसू या सुआटा की प्रतिमा या चित्र बनाकर सूर्योदय से पूर्व रंगोली बनाकर नवरात्रि की अष्टमी तक गीत गाते हुए कुवांरी लड़कियां सुआटा खेलती हैं। बालिकाएँ झाँझी, मिट्टी की छेददार हाँडी- जिसमें दिया जलता रहता है, लेकर एक घर से दूसरे घर फेरा करती हैं, झाँझी के गीत गाती हैं और पैसे माँगती हैं। ये गीत कथा की दृष्टि से अद्भुत, किन्तु मनोरंजक होते हैं। क्वार के महीने में शारदीय नवरात्र के अवसर पर लड़के टेसू के गीत गाते हैं और लड़कियाँ झाँझी के गीत गाती हैं। मुझे लगता है, दसवीं शताब्दी से शुरू हुआ सुआटा उस समय उठल पथल और बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा वलात कन्याओं के अपरहण के डर से शुरू हुआ। जिसमें सुआटा (आक्रमणकारियों) की आराधना है, साथ ही सुआटा को खत्म करने वाली देवी (हिमानचलजू की कुँवर) की आराधना भी हैं। अष्टमी की रात्रि झिंझरी (छेदवाला मटका जिसमें जलते दिये की रोशनी फेलती हैं) लेकर घर - घर रोशनी फैलाने की चेष्टा करते हुए गाती हैं। "पूँछत-पूँछत आये हैं नारे सुआटा, कौन बड़े जू की पौर सुआ " घर से जब गृहणी न...

जब किस्मत में लिखे हैं घोड़े तो कहाँ से मिलेंगे पकौड़े ...

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वैसे तो अपुन की जिंदगी सात साल पहले तक बड़ी बिंदास टाइप रही ... एकदम झकास मस्तमौला कटपीस भी अपुन को जीवन भर मिलते रहे ... हँसते रहे हंसाते रहे ... एकदम खानाबदोशी जीवन ... जहाँ मिल गई दो वहीँ गिर के गए सो ... कुछ एहि टाइप ... बचपन से किशोर अवस्था तक बस मस्ती भरा जीवन ... बात उन दिनों की जब इण्टर के एग्जाम थे ... तेज गर्मी ... टपकती गंधयुक्त पसीने और थपेड़ों वाली लू वाली गर्मी में रसायन विज्ञान का दूसरा पेपर ... माता राम ने बढ़िया तेज काजल लगे विकास बाबू को दही पेड़े खिला टीका करके पेपर तोड़ने भेज दिया ... सेंटर पर पहुंचे ... सीट तलाशी विराज भी गए ... कुछ ही देर मैं एक लंब तड़ंग मोटा भारी भरकम पर्वताकार भीमकाय काया आगे वाली सीट पर बैठ गई ... मुंह में ठूसम ठूस गुटखा ... साथ में दो बन्दूक लिए पहलवान जो भाईजान को छोड़ने आये थे ... बगल में बन्दूक भी टांगे थे ... दरअसल आगे की बात के पहले बता दूँ हमारे शहर के सबसे अमीर व्यापारी के सपूत थे ... सो मास्साब लोग भी उस भीमकाया की जी हुजूरी में थे ... खैर पेपर बंटा ... शांति से मैं अपना पेपर हल करने लगा ... आगे वाले भैया अपने दोनों जेबों में नकल सामग...