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इस्लाम का वास्तविक पुरातन यतार्थ

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प्राचीन कालीन अरबों के प्रधान तीर्थ मक्का का भी बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। शायर-उल-ओकुल की भूमिका में मक्का में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित होने वाले वार्षिक मेले "ओकाज़" का वर्णन है। स्मरण रहे, वर्तमान प्रचलित वार्षिक हज-यात्रा भी कोई इस्लामी विशेषता नहीं है, अपितु प्रागैस्लामी "ओकाज" (धार्मिक मेला) का ही परिवर्तित रूप है। इस मेले का मुख्य आकर्षण मक्का के मुख्य मन्दिर मक्केश्वर महादेव (अब ‘अल-मस्जि़द-अल-हरम') के प्रांगण में होने वाला एक सारस्वत कवि सम्मेलन था, जिसमें सम्पूर्ण अर्वस्थान से आमन्त्रित कवि काव्य पाठ करते थे। ये कविताएँ पुरस्कृत होती थीं। सर्वप्रथम कवि की कविता को स्वर्ण पत्र पर उत्कीर्ण कर मक्केश्वर महादेव मन्दिर के परमपावन गर्भगृह में लटकाया जाता था। द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त कविताओं को क्रमशः ऊँट और भेड़/बकरी के चमड़े पर निरेखित कर मन्दिर की बाहरी दीवारों पर लटकाया जाता था। इस प्रकार अरबी साहित्य का अमूल्य संग्रह हजारों वर्षों से मन्दिर में एकत्र होता चला आ रहा था। यह ज्ञात नहीं है कि यह प्रथा कब प्रारम्भ हुई थी,...