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Showing posts with the label कविता

गरीब की आग

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उस आदमी का घर जल रहा था। वह अपने परिवार सहित आग बुझाने का प्रयास कर रहा था लेकिन आग प्रचंड थी।बुझने का नाम न लेती थी। ऐसा लगता है जैसे शताब्दियों से लगी आग है, या किसी तेल के कुएं में माचिस लगा दी गई है या कोई ज्वालामुखी फट पड़ा है। आदमी ने अपनी पत्नी से कहा, "इस तरह की आगतोहमनेकभी नहीं देखी थी।" पत्नी बोली, "हां क्योंकि इस तरह की आग तो हमारे पेट में लगा करती है। हम उसे देख नहीं पाते थे।" वे आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे कि दो पढ़े-लिखे वहां आ पहुंचे। आदमी ने उनसे कहा, "भाई हमारी मदद करो।" दोनों ने आग देखी और डर गए। बोले, "देखो, हम बुद्धिजीवी हैं, लेखक हैं, पत्रकार हैं, हम तुम्हारी आग के बारे में जाकर लिखते हैं।" वे दोनों चले गए। कुछ देर बाद वहां एक आदमी और आया। उससे भी इस आदमी ने आग बुझाने की बात कही। वह बोला, "ऐसी आग तो मैंने कभी नहीं देखी… इसको जानने और पता लगाने के लिए शोध करना पड़ेगा। मैं अपनी शोध सामग्री लेकर आता हूं, तब तक तुम ये आग न बुझने देना।"वह चला गया। आदमी और उसका परिवार फिर आग बुझाने में जुट गए। पर आग थी कि काबू में ही न आ...

आदमी को मारा आदमी के गुमान ने....

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हाथी के दुश्मन हो गए हाथी दाँत, गेंडे के दुश्मन उसी के सींग, हिरनों का बैरी हुआ उन्हीं का चर्म, शेरों-बाघों की शत्रु उन्हीं की खाल और अवयव. विषधर का शत्रु हुआ उसी का विष, समूर की ज़ान का गाहक हुआ उसी का लोम , आदमी को मारा आदमी के गुमान ने कोयले को मारा अंदर के खान ने कर्ण को मारा, कर्ण के दान ने जान को मारा जहान ने...  इसी तरह प्रेमियों की जान ली प्रेम ने सुकरात को मारा सत्य ने, ईसा को प्रेम ने, और करूणा ने कृष्ण को गाँधी को मारा गोडसे ने नहीं, गाँधी के उदात्त ने।  नदी का शत्रु हुआ उसका प्रवाह, पहाड़ को डसा ऊँचाई ने, और वनों की देह छलनी की काठ ने।  इसी तरह इसी तरह आदमी के भीतर आदमी को मारा आदमी के गुमान ने? तो सुनों, दोस्तों!  चलो मारे अंदर के काले बलवान को अंदर पलते झूठे अभिमान को आत्म प्रशंसा में मग्न महान को एक अच्छे, सुसंस्कृत, गरिमामय भारत के निर्मान को #सुधीर सक्सेना  

एक डोली चली एक अर्थी चली,,

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एक डोली चली एक अर्थी चली,, बात दोनों में कुछ इस तरह से चली , बोली डोली तुम्हे किसने धोका दिया, तेरा ये क्या किया ?? तू बता दे जरा मुझको ए दिल जली, कहाँ तू चली...?? अर्थी बोली ....... चार तुझमे लगे, चार मुझमे लगे (कंधे) फुल तुझपे सजे, फुल मुझपे सजे, फर्क इतना ही है अब सुन ले सखी, तू पिया को चली मै प्रभु को चली ..!! मांग तेरी भरी, मांग मेरी भरी , चूड़ी तेरी हरी, चूड़ी मेरी हरी , फर्क इतना ही है अब सुन ले सखी.. तू जहाँ में चली, मै जहाँ से चली..!! एक सजन तेरा खुश हो जायेगा , एक सजन मेरा मुझको रो जायेगा , फर्क इतना ही है अब सुन ले सखी,, तू विदा हो चली .... मै अलविदा हो चली ...!!!

"दर्द सीने में बहुत गहरा हैं"

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दर्द सीने में बहुत गहरा हैं हरपल उसपर तन्हाइयो का पहरा है प्यार/इश्क/महोब्बत सब करके देखा उसने फिर जाना यहा हर शख्स ही बहरा है अब तो परिंदे भी आजादी से घुम नही सकते आकाश में भी अब झख्मी हवाओ का पहरा है दरख्त भी उगते है यहा ये सोच सोचकर जो सर उठायेगा वही पहले कलम होगा दह्सत्गार्दो का आज हर मोड़ पर बसेरा है वह जो चलती है सगीन राहो पर कुमारी क्या जाने नजरो का वो मिजाज तुम्हारी फिर भी हालातो से लड़ते लड़ते मंजिल पाना सीख गयी अब हर नारी ।।                                                                                   # रुचिर अक्षर

जिंदगी जिंदगी है

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जिंदगी जीने का नाम है ,  झेलने का नही ... जिंदगी अनेक अनेक एहसासों का नाम है , एहसानों का नही ,,,,,,  जिंदगी मुक्कद्दर का नाम है .,  मुखासित होने का नही .... जिंदगी खुशियों का नाम है , खामोशियो का नही ....  जिंदगी दर्द बांटने का नाम है , दर्द बटोरने का नही.... जिंदगी कुछ बनने का नाम है , बिगड़ने का नही .... जिंदगी गलतिय करने का नाम है , ग्लानि महसूस करने का नही ,,,,  जिंदगी जीने के लिए है , झेलने के लिए नही ......  जिंदगी जिंदगी है !!!!!!!!!!!!! 

" इंसानियत "

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निडर न तू था न मैं थी, बस हिम्मत नही थी .... कायर न तू था न मैं थी , बस होसला नही था.... गलत न तू था न मैं थी ,  बस राह गलत थी .... शब्द तेरे पास थे मेरे पास थे , बस बोलने के लिए बोली नही थी ... सच तुझे पता था सच मुझे पता था , बस ईमानदारी नही थी .... कमजोर न तू था न मैं थी , बस आत्म परिचय नही था .... वक़्त तेरे पास था मेरे पास था , बस इक्छा नही थी ... भरोसा तेरे पास था मेरे पास था , बस उसपे विश्वास नही था .. आखिर में  इंसान तू था मैं भी थी  बस " इंसानियत " न तुझमे बची थी न मुझमे ...!!!!

गीत लिखती चली जाऊं

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कभी बैठाना ना मुझको तुम अपनी ये पलकों पर । जो नजरें फ़ेर ली तुमने तो निश्चय ही मैं मर जाऊं ।। गर रखना है कहीं मुझको तो दे दो कुछ जगह दिल में । जीते जी ही मैं तुझमें मिलकर एक हो जाऊं ।। मैं फ़िदा हैं तुझ पर यूं कि दे सकती हूं जां तुझ पर । तेरी इक गरज पर माही मैं खुद को वार ही जाऊं ।। यार तेरी ही यारी में मैं मदहोश हूं इतनी । कि लब जब भी कभी खुलते गीत तेरे ही मैं गाऊं ।। बस तेरी ही सूरत को निरखती मैं रहूं पल । तेरे मदमस्त नैनों पर गीत लिखती चली जाऊं.....

मुझसे मुझको मिला गयी

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आखिर... ये रुसवाई ये तन्हाई मुझसे मुझको मिला गयी, क्या था... क्या हो गया मैं चुपके से मुझको बता गयी, वो नादाँ इश्क मेरा यूँ ही बेसबब ना था मुझसे खोये मेरे गुरुर को... फिर मुझ तक पंहुचा गयी, ये तन्हाई और ये रुसवाई... कितना कुछ मुझको बदल गयी वो अल्हड ख्वाब मेरे और बेफिक्र जीने का अंदाज, जिंदगी को बस यूँ ही  समझने को मेरे, मुझको बहुत संजीदा कर गयी,

बस खड़ा हूं रिमझीम बारिश में

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'आत्म' हत्या से पहले मै खड़ा देख रहा था बहती नदी को ऊपर से सोच रहा था  ये गाड़िया  ये लोग ये भागती जिन्दगी ये कटते लोग ये सिमटते रिश्ते ये बिगड़ती दुनिया ये बेगानी सी हवा ये मरते जज्बात  ये सिर्फ ख्याल "मैं" का मै कह रहा था खुद से क्या सभी जैसे दिखते है  वैसे होते है मै महसूस कर रहा था इस दुनिया से परे की दुनिया को और भय खा रहा था  वो दुनिया भी इस दुनिया की तरह  बेकार निकली तो बस खड़ा हूं रिमझीम बारिश में आत्म हत्या से पहले... #अज्ञात 

' आत्म ' की हत्या ही तय करती है मन की शांति

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यात्रा और आत्महत्या से पहले  तय कर लेना पड़ता है सारी तैयारी का जायजा कंही कुछ रह तो नही गया क्यूंकि नही होता आभास कि वापस कब लौटेंगे आत्महत्या दरअसल एक यात्रा है फक्त फर्क इतना सा है इस यात्रा मे  कि मालूम नही रहता मुसाफिर को कंहा जायेगा वो मगर इतना जानता है कि वो लौट नही पायेगा कभी एक अनंत यात्रा से पहले  एक और यात्रा  एक लंबी यात्रा से पहले  एक छोटी यात्रा मन की कर लेना बेहतर है और जब बटोर ले देह सारा सामान मन आश्वत हो जाये कि अब कुछ नही बचा लेने को इस जग से क्यूंकि सच मर चुका तो निकल लेना बेहतर होता है यात्रा पर मन की शांति के लिए... शायद यात्रा दे पाये शान्ति जलते मन को और जब आत्म ही नही रहेगी तो मन अशांत क्यूं रहेगा भला.. ' आत्म ' की हत्या ही तय करती है मन की शांति... ॐ शांति शांति शांति ॐ 

सदियाँ बीत जाती हैं, उसे फिर भूल पाने में

!!!!आंसू - आंसू जीवन की मधुशाला है  क्या है बोलो प्रेम, जहर का प्याला है  रोते -रोते खुद ही चुप हो जाते हैं किससे रूठें, कौन मनाने वाला है! कभी आँखों के गौहर तो कभी, ज़ज्बात के मोती ...... ना पूंछो क्या नहीं खोया है हमने तुमको पाने में .... एक पल भी नहीं लगता किसी से दिल लगाने में ... की सदियाँ बीत जाती हैं, उसे फिर भूल पाने में ...!!

फिर किसी आहट का इंतज़ार हो जाए .

जब किसी से प्यार हो जाए ज़िन्दगी चीते की रफ्तार हो जाए  मिलता है कभी , जब भी दिल का साथी खिज़ा के दौर में भी बहार हो जाए . अमावस में ,भी चराग जलाने का मन नही करता जब किसी की याद दिल पे सवार हो जाए . उनसे रिश्ते की पाकीज़गी सलामत रहें सदा डरता हूँ , ना कोई इसमें दरार हो जाए उनकी जब भी खेर--खबर मिलती है धड़कता दिल , गुले--गुलज़ार हो जाए . यादें दोड़ती है , खरगोश सी , मासूम सी ,अच्छी सी चलों आज फिर किसी आहट का इंतज़ार हो जाए . # अशोक 

अम्मा मेरे बाबा को भेजो री / अमीर खुसरो

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अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि सावन आया बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री - कि सावन आया अ म्मा मेरे भाई को भेजो री - कि सावन आया बेटी तेरा भाई तो बाला री - कि सावन आया अम्मा मेरे मामू को भेजो री - कि साबन आया बेटी तेरा मामु तो बांका री - कि सावन आया

बचपन के दिनों की ये कविता

हम सब चाँदको अपने अपने ढंग से देखते है .. दिनकर जी भी आप भी और मै भी । बचपन के दिनों की ये कविता मुझे आज भी पसंद है | ह ठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने` कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज लिवायें सी दे एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये! # चांद एक दिन / रामधारी सिंह 'दिनकर'

याद आते है वो स्कूल के दिन..

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1  जुलाई पर विशेष   याद आते है वो स्कूल के दिन , ना जाते थे स्कुल दोस्तों के बिन, कैसी  थी वो दोस्ती कैसा था वो प्यार, एक दिन की जुदाई से डरता थे जब  आता था शनिवार, चलते चलते पत्थरों पर मारते थे ठोकर, कभी  हंसकर चलते थे तो कभी चलते थे रोकर ,।।     #अज्ञात 

भुल्ल्कड़.....हास्य कविता

भुल्ल्कड़~~ प्रितेश पाठक "यावर" मेरे साथ ये मुसीबत हैं, मुझे भूलने की आदत हैं| एक दिन... नहाकर निकला, बड़े मूड में गुनगुना रहा था, अखबार उठाया और वो गाना भूल गया| फिर एक दिन... दूध वाले को पैसे देने थे, कही भूल न जाऊ सोचकर, ५०० का नोट जेब से निकाला, कही रखकर भूल गया| कुछ दिन बाद... एक शाम "मोपासा" पढ़ने का मन किया, चाय बनाकर छत पर ले गया, कहानी पढते पढते पहली चुस्की ली, पता चला शक्कर भूल गया| फीकी चाय की चुस्की में, ज़ायके की तो बात न रही, पर उस शाम गाना याद आया, "दिल ढूंडता हैं फिर वही..." "मोपासा" की कहानी में भी, फिर दिलचस्प एक मोड आया, मैंने व्याकुल होकर पन्ना पलटा, तो ५०० का एक नोट आया, अफ़सोस फीकी चाय का भी, तब जताना फ़िज़ूल गया, एक चुस्की जब मीठी लगी, तो याद आया, शक्कर डाली तो थी, पर हिलाना भूल गया| कहता हू न... मेरे साथ ये मुसीबत हैं, मुझे भूलने की आदत हैं|                 http://www.tahriir.com/ से साभार _______________________

वक़्त नहीं ....

" **वक़्त  नहीं  **" हर   ख़ुशी   है  लोगों  के दामन  में , पर  एक  हंसी  के  लिए  वक़्त  नहीं . दिन  रात  दौड़ती  दुनिया  में , ज़िन्दगी  के  लिए  ही  वक़्त  नहीं . माँ  की  लोरी  का  एहसास  तो  है , पर  माँ  को  माँ  कहने  का  वक़्त  नहीं . सारे  रिश्तों  को  तो  हम  मार  चुके , अब  उन्हें  दफ़नाने  का  भी  वक़्त  नहीं . सारे  नाम  मोबाइल  में  हैं , पर  दोस्ती  के  लिए  वक़्त  नहीं . गैरों  की  क्या  बात  करें , जब  अपनों  के  लिए  ही  व क़्त  नहीं . आँखों  में  है  नींद  बड़ी , पर  सोने  का  वक़्त  नहीं . दिल  है  घावों   से  भरा  हुआ , पर  रोने  का  भी  वक़्त  नहीं...

मथुरा जी का जगु पंडा (कविता )

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 बचपन में बालहंस पत्रिका में पढ़ी थी याद आ गई मथुरा जी का जगु पंडा ,५५ लड्डू खाता , लग जावे जब होड़ तो रबड़ी ८ किलो पी जाता , ५२ इंच का तोंद का घेरा , ८ इन्च की चोटी, जिस दिन घर में रोटी खाता ,उस दिन घरवाली रोती .