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◆||#सुर_संगीत||◆

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"अकबर" के दरबार मे कला प्रेमियों का जमावड़ा रहता था, 9 रत्नों में एक थे तानसेन। "तानसेन" "गुरु हरिदास" के शिष्य थे, वही "गुरु हरिदास" जिन्होंने अपनी सुरों की साधना से बिहारी जी को पुनः प्रकट कर दिया था और उन्हें विवश किया वृंदावन के निधिवन में रहने को। "अकबर" एक दिन "तानसेन" का संगीत सुनकर इतने मंत्रमुग्ध हुए की उन्होंने आगरा में यह घोषणा करवग दी की "तानसेन" के अतिरिक्त कोई भी गाना नही गायेगा, अन्यथा उसे "तानसेन" के लिए चुनौती समझा जाएगा और यदि उसने "तानसेन" को नही हराया तो उसे मृत्यु दंड दे दिया जाएगा। एक दिन साधुओं की एक टोली सुबह सुबह भजन गाती बांके बिहारी के दर्शनों के लिए जा रही थी। आगरा के निकट से जब वे लोग गुजरे तो सिपाहियों ने उन साधुओं को पकड़ लिया और कहा,"क्या, तुम्हें मृत्यु का भय नही है, जो गाना गा रहे हो.? चलो अब बादशाह के दरबार में।" साधु घबराए मगर क्या करें जाना तो था ही सो चल पड़े दरबार की ओर। अकबर ने पूछा, "इनको दरबार मे क्यों लाया गया ?" सिपाहियों ने कारण बताया त...

रक्षाबंधन -Heart Touching Short Story On Raksha Bandhan

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पिछले तीन-चार या शायद उस से भी अधिक महीनों से भैया ने मुझे फोन नहीं किया था. गाहे बगाहे मैं जब फोन करती, भैया से बातें हो नहीं पाती. भाभी अलबत्ता उनकी व्यस्तता का रोना रोती रहतीं. रक्षाबंधन आ रहा था, मुझे बार बार अपनी बचपन वाली 'राखी' याद आ रही थी. कितना बड़ा त्यौहार होता था तब ये. रक्षा बंधन के लिए मम्मी हमदोनों भाई-बहन के लिए नए कपडे खरीदती. बाज़ार में घूम घूम भैया की कलाई के लिए सबसे स्पेशल राखी खरीदना. सुनहरी किरणों से सजी, वो मोटे से स्पंज नुमा फूल पर 'मेरे भैया' लिखा होना. समय के साथ राखी के स्वरुप और डिज़ाइन में आज बहुत फर्क आ गया है. अब तो पहले अधिक सुंदर और डिज़ाइनर राखियाँ बाज़ार में उपलब्ध हैं. पर दिल उस पल के लिए तडपता है जब भाई को सामने बिठा मैं खुद राखी बांधती थी. तिलक लगाती, आरती उतराती और मिठाई खिलाती. मम्मी पूरे साल हम दोनों भाई-बहन को एक सा जेब खर्च देती थी, जिसे हम खर्च ना कर गुल्लक में डाल देतें. पर रक्षा बंधन के बाद मेरे गुल्लक में भैया से अधिक पैसे हो जातें. भैया कभी कभी खीजता हुआ बोलता भी था, "सिर्फ मैं ही क्यूँ पैसे दूँ, ये भी दे मुझे. पांच रूपये...

अदालत का झंझट - लघुकथा - Hindi Short Story

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‪#‎ अदालत‬  की झंझट से बचने का एक अनुभव आपसे 'शेयर' करना चाहता हूँ.... अब से 19 वर्ष पूर्व हमारी होटल से जुड़ी एक दूकान 2500/- प्रति माह के हिसाब से किराये पर मेरे पिता जी ने उठाई थी. लिखित शर्त थी कि हर तीन वर्ष में 10% किराया बढ़ाया जाएगा. 15 वर्ष में यह किराया बढ़ते-बढ़ते 3660/- मासिक हो गया, मैंने किराएदार से किराया 'रिव्यू' करने का अनुरोध किया क्योंकि उस दूकान का तात्कालीन प्रचलित किराया 30 से 35 हजार रुपए प्रति माह हो चुका था, लगभग दस गुना अधिक.किराएदार ने उचित तर्क दिया  कि अनुबंध के हिसाब से हर तीन वर्ष में किराया बढ़ाया जा रहा है, वही मिलेगा। इस प्रकार उन्होंने 'रिव्यू' करने से इंकार कर दिया। मैंने उनसे दूकान खाली करने का अनुरोध किया, उन्होंने दूकान खाली करने से भी इंकार कर दिया और मुझसे कहा- 'जैसा बन सके, करवा लो।' दूकान खाली करवाने के जो आजकल तरीके चल रहे हैं, वे मेरे स्वभाव के अनुरूप नहीं थे लेकिन एक तरीका सज्जनता वाला बचा था, अदालत में दूकान खाली करने के लिए मुकदमा दायर करना. मैंने अपने वकील मित्र  शर्मा से चर्चा की तो उन्होंने कहा- 'दूकान खा...