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विश्व के पहले शल्य चिकित्सक - आचार्य सुश्रुत

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विश्व के पहले शल्य चिकित्सक - आचार्य सुश्रुत || शल्य चिकित्सा के जनक: सुश्रुत सुश्रुत प्राचीन भारत के महान चिकित्साशास्त्री एवं शल्यचिकित्सक थे। उनको शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है।  शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के पितामह और 'सुश्रुत संहिता' के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में काशी में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की। सुश्रुत संहिता को भारतीय चिकित्सा पद्धति में विशेष स्थान प्राप्त है। (सुश्रुत संहिता में सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र कहा है। विश्वामित्र से कौन से विश्वामित्र अभिप्रेत हैं, यह स्पष्ट नहीं। सुश्रुत ने काशीपति दिवोदास से शल्यतंत्र का उपदेश प्राप्त किया था। काशीपति दिवोदास का समय ईसा पूर्व की दूसरी या तीसरी शती संभावित है। सुश्रुत के सहपाठी औपधेनव, वैतरणी आदि अनेक छात्र थे सुश्रुत का नाम नावनीतक में भी आता है अष्टांगसंग्रह में सुश्रुत का जो मत उद्धृत किया गया है;।। वह मत सुश्रुत संहिता में नहीं मिलता, इससे अनुमान होता है कि सुश्रुत संहिता के सिवाय दूसरी भी कोई संहिता सुश्रुत के नाम से प्रसिद्ध थी सुश्रुत के नाम पर आयुर्वेद भी प...

अर्जुन की छाल है बहुत गुणकारी

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------- - सर्दियों में अकसर हाय बीपी और हृदयाघात के मरीज़ बढ़ जाते है। - इसके लिए नियमित सुबह शाम अर्जुन की छाल के चूर्ण की चाय बना कर पिए। - अर्जु न की छाल को कपड़े से छान ले इस चूर्ण को जीभ पर रखकर चूसते ही हृदय की अधिक अनियमित धड़कनें नियमित होने लगती है। - अर्जुन हृदय के विराम काल को बढ़ाता है। - यह शीतल, हृदय को हितकारी, कसैला और क्षत, क्षय, विष, रुधिर विकार, मेद, प्रमेह, व्रण, कफ तथा पित्त को नष्ट करता है। रक्तपित्त - सुबह अर्जुनकी छाल क काढ़ा बनाकर पीने से रक्तपित्त दूर हो जाता है। - इस काढ़े से पेशाब की रुकावट दूर हो जाती है. लाभ होने तक दिन में एक बार पिलाएं। - अर्जुन की छाल में जरा-सी भुनी हुई हींग और सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ फंकी लेने से गुर्दे का दर्द, पेट के दर्द और पेट की जलन में लाभ होता है। - रक्तदोष, त्वचा रोग एवं कुष्ठ रोग में अर्जुन की छाल का 1 चम्मच चूर्ण पानी के साथ सेवन करने से व इसकी छाल को पानी में घिसकर त्वचा पर लेप करने एवं अर्जुन की छाल को पानी में उबालकर या गुनगुने पानी में मिलाकर नहाने से कुष्ठ और त्वचा रोगों में बहुत लाभ होता है। - आग से ...

दातुन के फायदे के आगे टूथब्रश बेकार है ।

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दातुन के इन फायदों को जानकर टूथब्रश करना छोड़ देंगे------ आज कल हर घर में दांत साफ करने के लिए लोग टूथब्रश का इस्तेमाल करने लगे हैं। जबकि दातुन के इतने फायदे हैं जिसे जानकर आप टूथब्रश की बजया दातुन का इस्तेमाल करने लगेंगे। दातुन न सिर्फ आपकी सेहत और बौद्घिक क्षमता के लिए बेहतर है बल्कि दातुन धर्म और अध्यात्म की दृष्टि से भी उत्तम बताया गया है। यही कारण है कि व्रत, त्योहार के दिन बहुत से लोग ब्रश की बजाय दातुन से दांत साफ करते हैं। धार्मिक दृष्टि से दातुन का महत्व इसलिए बताया गया है कि क्योंकि दातुन जूठा नहीं होता जबकि टुथब्रश आप हर दिन नया नहीं प्रयोग करते। एक ही टूथब्रश को धोकर आप कई बार इस्तेमाल करते हैं। इससे ब्रश शुद्घ और पवित्र नहीं रह जाता है। इसलिए व्रत और त्योहार के दिन ब्रश करना शास्त्रों की दृष्टि से उचित नहीं है। जबकि आयुर्वेद के अनुसार दातुन करने का फायदा चौंकाने वाला है। विभिन्न वृक्षो से प्राप्त दातुनों के फायदे (आयुर्वेदनुसार)------- बबूल आयुर्वेद में बताया गया है कि दातुन सिर्फ आपके दांतों को ही चमकाता नहीं है बल्कि यह आपकी बौद्घिक क्षमता और स्मरण शक्ति को भी बढ़ता है। ...

आठ जादुई चीजे जो लंबे समय तक बुढ़ापे को आने से रोकती है ।

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अनाज विटामिन, फाइबर, मिनरल और एंटीऑक्‍सीडेंट से भरपूर अनाज त्‍वचा की कोशिकाओं को मजबूत बनाकर बुढ़ापे को दूर रखता हैं। साथ ही इससे वजन को नियंत्रित रखने व मोटापा कम करने में मदद मिलती है। जिससे आप बने रहते हैं सदा जवां। बादाम बादाम त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है। विटामिन 'ई' की प्रचुरता वाला बादाम सबसे अच्छा प्राकृतिक मॉइस्चराइजर है। बादाम में एंटीऑक्‍सीडेंट, फाइटोकेमिकल्‍स, विटामिन, मिनरल और ओमेगा-3 फैटी एसिड की मौजूदगी बुढ़ापे को दूर रखती है। साथ ही यह याददाश्‍त दुरुस्‍त रखने में भी मदद करता है। बादाम को रात में भिगो कर सुबह में खाली पेट खाना लाभकारी है। दही दही से मिलने वाला फॉस्फोरस और विटामिन डी शरीर के लिए लाभकारी होता है। दही में कैल्शियम को एसिड के रूप में समा लेने की खूबी होती है। दही खाने से शरीर स्किन में एक अच्‍छा ग्‍लो रहता है। दही त्‍वचा में नमी बनाए रखने, कील-मुहांसों से मुक्ति व धूप से हुई हानि को कम करने में सक्षम होता है। लैक्टिक एसिड से भरपूर दही मृत त्‍वचा हटाकर रोम छिद्रों की ऑक्‍सीजन सोखने की क्षमता बढ़ाता है। ब्रोकोली ब्रोकोली में विटामिन 'सी' ...

क्या आपको कुछ याद नहीं रहता...? स्मरण शक्ति बढ़ायें|

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आजकल अच्छा खान पान न होने की वजह से याददाश्त का कमजोर होना एक आम समस्या बन गई है।हर आदमी अपनी भूलने की आदत से परेशान है लेकिन अब आपको परेशान हो की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आयुर्वेद में इस बीमारी को दूर करने के सरलतम उपाय बताए हैं। 1. सात दाने बादाम के रात को भिगोकर सुबह छिलका उतार कर बारीक पीस लें । इस पेस्ट को करीब 250 ग्राम दूध में डालकर तीन उबाल लगाऐं। इसके बाद इसे नीचे उतार कर एक चम्मच घी और दो चम्मच शक्कर मिलाकर ठंडाकर पीऐं। 15 से 20 दिन तक इस विधि को करने से याददाश्त तेज होती है। 2. भीगे हुए बादाम को काली मिर्च के साथ पीस लें या ऐसे ही खूब चबाचबाकर खाऐं और ऊपर से गुनगुना दूध पी लें। 3. एक चाय का चम्मच शंखपुष्पी का चूर्ण दूध या मिश्री के साथ रोजाना तीन से चार हफ्ते तक लें । विशेष:  सिर का दर्द, आंखों की कमजोरी, आंखों से पानी आना, आंखों में दर्द होने जैसे कई रोगों में यह विधि लाभदायक है ये पांच चीजे खाएंगे...तो याददाश्त कमजोर नहीं रहेगी किसी भी चीज को रखने के बाद उसे ढंूढने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ता है। अगर आपके साथ भी यही समस्या है तो नीचे लिखी चीजों को अपने आहार में शाम...

आयुर्वेदिक दोहे:-- उपयोगी बाते

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१ दही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय,  होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय.. २ बहती यदि जो नाक हो, बहुत बुरा हो हाल, यूकेलिप्टिस तेल लें, सूंघें डाल रुमाल.. ३ अजवाइन को पीसिये , गाढ़ा लेप लगाय, चर्म रोग सब दूर हो, तन कंचन बन जाय.. ४ अजवाइन को पीस लें , नीबू संग मिलाय, फोड़ा-फुंसी दूर हों, सभी बला टल जाय.. ५ अजवाइन-गुड़ खाइए, तभी बने कुछ काम, पित्त रोग में लाभ हो, पायेंगे आराम.. ६ ठण्ड लगे जब आपको, सर्दी से बेहाल, नीबू मधु के साथ में, अदरक पियें उबाल.. ७ अदरक का रस लीजिए. मधु लेवें समभाग, नियमित सेवन जब करें, सर्दी जाए भाग.. ८ रोटी मक्के की भली, खा लें यदि भरपूर, बेहतर लीवर आपका, टी० बी० भी हो दूर.. ९ गाजर रस संग आँवला, बीस औ चालिस ग्राम, रक्तचाप हिरदय सही, पायें सब आराम.. १० शहद आंवला जूस हो, मिश्री सब दस ग्राम, बीस ग्राम घी साथ में, यौवन स्थिर काम.. ११ चिंतित होता क्यों भला, देख बुढ़ापा रोय, चौलाई पालक भली, यौवन स्थिर होय.. १२ लाल टमाटर लीजिए, खीरा सहित सनेह, जूस करेला साथ हो, दूर रहे मधुमेह.. १३ प्रातः संध्या पीजिए, खाली पेट सनेह, जामुन-गुठली पीसिये, नहीं रहे मधुमेह.. १४ सात पत्र लें ...

कत्था (खदिर, खैर )catechu

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संस्कृत, खदिर। हिन्दी, कत्था। अंग्रेजी, कच ट्री। लैटिन, एकेषिया कटेचु। मराठी, खैर। बंगाली, विट्टखैर। गुजराती, गन्धिलो|  कत्थे का पेड़ भारत में १५०० मीटर की ऊंचाई तक पंजाब, ,उत्तर पश्चिम हिमालय,मध्यभारत,बिहार,महाराष्ट्र,राजस्थान,कोंकण,आसाम,उड़ीसा ,दक्षिण भारत एवं पश्चिम बंगाल में पाया जाता है | इसके पेड़ नदियों के किनारे अधिक होते हैं | कत्थे का पेड़ बबूल के पेड़ की तरह होता है | कत्था की टहनियां पतली व 11 से 12 सीकों के जोड़ों से युक्त होती हैं जिसमें 30 से 50 जोड़ों में छोटे-छोटे पत्ते लगते हैं। जब इसके पेड़ के तने लगभग एक फुट मोटे हो जाते हैं तब इन्हें काटकर छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर भट्टियों में पकाकर काढ़ा बनाया जाता है | फिर इसे चौकोर रूप दिया जाता है जिसे कत्था कहते हैं | आइये जानते हैं|   कत्थे के कुछ औषधीय प्रयोग -  300 मिलीग्राम की मात्रा में कत्थे का चूर्ण मुंह में रखकर चूसने से गला बैठना, आवाज रुकना, गले की खराश, मसूढों का दर्द, छाले आदि दूर होती है। इसका प्रयोग दिन में 5 से 6 बार कुछ दिनों तक नियमित करना चाहिए। कत्था, हल्दी और मिश्री 1-1 ग्राम की मात्रा में मिलाकर च...

जीरा (जीरक)Cumin

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संस्कृत में इसे जीरक कहा जाता है, जिसका अर्थ है, अन्न के जीर्ण होने में (पचने में) सहायता करने वाला। जीरा श्वेत, श्याम और अरण्य (जंगली) तीन प्रकार का होता है | श्वेत या सफ़ेद जीरे से सब परिचित हैं क्यूंकि इसका प्रयोग मसाले के रूप में किया जाता है | औषधियों के रूप में भी जीरे का बहुत उपयोग किया जाता है | सफ़ेद जीरा दाल -सब्जी छौंकने के काम आता है तथा शाह जीरे का उपयोग विशेष रूप से दवा के रूप में किया जाता है | जीरे की खेती समस्त भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में की जाती है | कई अलग अलग संस्कृतियों, जीरा के व्यंजनों जड़ी बूटी जीरक, अजमोद परिवार के एक सदस्य के सूखे बीज है.  जीरे के औषधीय गुण - 1 जीरा, धनिया और मिश्री तीनों को बराबर मात्रा में मलाकर पीस लें | इस चूर्ण की 2-2 चम्मच सुबह-शाम सादे पानी से लेने पर अम्लपित्त या एसिडिटी ठीक हो जाती है |  2  कैल्शियम और आयरन से भरपूर जीरा दूध पिलाने वाली माताओं के लिए बहुत लाभकारी होता है। इसके लिए जीरे को भून कर पाउडर बना लें और एक बड़ा चम्‍मच जीरा सुबह शाम गरम पानी या गरम दूध से लेने से फायदा होता है। 3 पांच ग्राम ...

जौ (BARLEY) -

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भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से जौ का प्रयोग किया जाता रहा है | हमारे ऋषि मुनियों का प्रमुख आहार जौ ही था | प्राचीन वैदिक काल तथा आयुर्वेदीय निघण्टुओं एवं संहिताओं में इसका वर्णन प्राप्त होता है | भावप्रकाश निघण्टुमें तीन प्रकार के भेदों का वर्णन प्राप्त होता है |  स्वाद एवं आकृति के दृष्टिकोण से जौ, गेहूँ से भिन्न दिखाई पड़ते हैं किन्तु यह गेहूँ की जाति का ही अन्न है | अगर गुण की दृष्टी से देखा जाए तो जौ गेहूं की अपेक्षा हल्का होता है | जौ को भूनकर, पीसकर उसका सत्तू बनता है | जौ में लैक्टिक एसिड, सैलिसिलिक एसिड, फॉस्फोरिक एसिड, पोटैशियम और कैल्शियम होता है |  जौ के विभिन्न औषधीय उपयोग -  1 - एक लीटर पानी में एक कप जौ को उबालकर इस पानी को ठंडा करके छानकर पीने से शरीर की की सूजन ख़त्म हो जाती है |  2 - जौ का सत्तू खाने या पीने से अधिक गर्मी में शरीर को ठंडक मिलती है |  3 - जौ को बारीक पीस कर तिल के तेल में मिलाकर शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से लाभ होता है |  4 - जौ का आटा 50 ग्राम और चने का आटा 10 ग्राम मिलाकर रोटी बनाएं | इस आटे की रोटी से मधुहेह नियंत्रित...

मासिक धर्म (Periods) से सबन्धित समस्याएँ

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 माताओ-बहनो को मासिक धर्म (Periods) से सबन्धित समस्याएँ होना साधारण बात है अक्सर माहवारी की अनियमिता हो जाती है ,अर्थात कई बार रक्तस्त्राव बहुत अधिक हो जाता है और कई बार क्या होता है बिलकुल ही नहीं होता ! और कभी कभी ऐसा भी होता है की ये 2-3 दिन होना चाहिए लेकिन 1 ही दिन होता है ,और कई बार 15 दिन ही दुबारा आ जाता है ! और कई बार 2 महीने तक नहीं आता ! तो ये मित्रो मासिक धर्म चक्र की अनियमिता की जितनी सभी समस्याएँ है इसकी हमारे आयुर्वेद मे बहुत ही अच्छी और लाभकारी ओषधि है वो है अशोक के पेड़ के पत्तों की चटनी ! हाँ एक बात याद रखे आशोक का पेड़ दो तरह का है एक तो सीधा है बिलकुल लंबा ज़्यादातर लोग उसे ही अशोक समझते है जबकि वो नहीं है एक और होता है पूरा गोल होता है और फैला हुआ होता है वही असली अशोक का पेड़ है जिसकी छाया मे माता सीता ठहरी थी ! फोटो मे देखिये !( अशोक वृक्ष के बारे मे जानने के लिए यहाँ किलिक करे   http://spandn.blogspot.in/2014/06/blog-post_23.html  ) तो इस असली अशोक के 5-6 पत्ते तोड़िए उसे पीस कर चटनी बनाओ अब इसे एक से डेढ़ गिलास पानी मे कुछ देर तक उबाले ! इतना उबाले की प...

भृंगराज (भांगरा)

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घने मुलायम काले केशों के लिए प्रसिद्ध भृंगराज के स्वयंजात शाक 1800 मीटर की ऊंचाई तक आर्द्रभूमि में जलाशयों के समीप बारह मास उगते हैं | सुश्रुत एवं चरक संहिता में कास एवं श्वास व्याधि में भृंगराज तेल का प्रयोग बताया गया है | इसके पत्तों को कृष्णाभ , हरितवर्णी रस निकलता है, जो शीघ्र ही काला पड़ जाता है | इसके पुष्प श्वेत वर्ण के होते हैं | इसके फल कृष्ण वर्ण के होते हैं | इसके बीज अनेक, छोटे तथा काले जीरे के समान होते हैं | इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से जनवरी तक होता है | भृंगराज (भांगरा) आज हम आपको भृंगराज के आयुर्वेदिक गुणों से अवगत कराएंगे -  1 - भांगरे का रस और बकरी का दूध समान मात्रा में लेकर उसको गुनगुना करके नाक में टपकाने से और भांगरा के रस में काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सिर पर लेप करने से आधासीसी के दर्द में लाभ होता है | 2 जिनके बाल टूटते हैं या दो मुंह के हो जाते हैं उन्हें सिर में भांगरा के पत्तों के रस की मालिश करनी चाहिए | इससे कुछ ही दिनों में अच्छे काले बाल निकलते हैं | 3 - भृंगराज के पत्तों को छाया में सुखाकर पीस लें | इसमें से 10 ग्राम चूर्ण लेकर उसमें शहद 3 ग्रा...

भारती देवी (तीन जुड़वां बच्चों की सबसे अधिक उम्र में मां बनने वाली महिला)

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भारती देवी भी हिसार, हरियाणा की ही हैं. राजो देवी की तरह भारती देवी भी सबसे अधिक उम्र में तीन जुड़वां बच्चों की मां बनने वाली दुनिया की पहली महिला हैं। डॉक्टरों के अनुसार भारती देवी 66 साल की हैं. 44 साल की शादी के बाद भी जब वह मां नहीं बन सकीं तो आईवीएफ के बारे में जानकारी मिलने पर इस ट्रीटमेंट के लिए तैयार हो गईं।  डॉक्टरों को इसके लिए तीन प्रयास करने पड़े. पहले दो प्रयासों में भारती के यूट्रस में 2-2 एंब्रियोज डाले गए थे. इनके फेल होने पर तीसरी बार तीन एंब्रियोज डाले गए जो सेट हो गए।  इस तरह भारती एक साथ तीन बच्चों (2 बेटे, एक बेटी) की मां बनने वाली सबसे अधिक उम्र की महिला बन गईं।

शहतूत -

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यह मूलतः चीन में पाया जाता है | यह साधारणतया जापान ,नेपाल,पाकिस्तान,बलूचिस्तान ,अफगानिस्तान  ,श्रीलंका,वियतनाम तथा सिंधु के उत्तरी भागों में पाया जाता है | भारत में यह  पंजाब,कश्मीर,उत्तराखंड,उत्तर प्रदेश एवं उत्तरी पश्चिमी हिमालय में पाया जाता है |  इसकी दो प्रजातियां पायी जाती हैं | १- तूत (शहतूत) २-  तूतड़ी |  इसके फल लगभग २.५ सेंटीमीटर लम्बे,अंडाकार अथवा लगभग गोलाकार ,श्वेत अथवा पक्वावस्था में  लगभग हरिताभ-कृष्ण अथवा गहरे बैंगनी वर्ण के होते हैं | इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जनवरी से जून तक  होता है | इसके फल में प्रोटीन,वसा,कार्बोहायड्रेट,खनिज,कैल्शियम,फॉस्फोरस,कैरोटीन ,विटामिन A ,B एवं  C,पेक्टिन,सिट्रिक अम्ल एवं मैलिक अम्ल पाया जाता है |आज हम आपको शहतूत के औषधीय गुणों से  अवगत कराएंगे - १- शहतूत के पत्तों का काढ़ा बनाकर गरारे करने से गले के दर्द में आराम होता है । २- यदि मुँह में छाले हों तो शहतूत के पत्ते चबाने से लाभ होता है | ३- शहतूत के फलों का सेवन करने से गले की सूजन ठीक होती है | ४- पांच - दस मिली शहतूत फल स्वरस का सेवन करने से जलन,अज...

कुछ नुस्खे : लहसुन के बड़े फायदे .

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लहसुन सिर्फ खाने के स्वाद को ही नहीं बढ़ाता बल्कि शरीर के लिए एक औषधी की तरह भी काम करता है.  इसमें प्रोटीन, विटामिन, खनिज, लवण  और फॉस्फोरस, आयरन व विटामिन ए, बी व सी भी पाए जाते हैं.  लहसुन शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है. भोजन में किसी भी तरह  इसका सेवन करना शरीर के  लिए बेहद फायदेमंद होता है आज हम बताने जा रहे हैं आपको औषधिय गुण से  भरपूर लहसुन के कुछ ऐसे  ही नुस्खों के  बारे में जो नीचे लिखी स्वास्थ्य समस्याओं में रामबाण है।  1-100 ग्राम सरसों के तेल में दो ग्राम (आधा चम्मच) अजवाइन के दाने और आठ - दस लहसुन की कुली  डालकर धीमी - धीमी आंच पर पकाएं. जब  लहसुन और अजवाइन काली हो जाए तब तेल उतारकर ठंडा कर  छान लें और बोतल में भर दें. इस तेल को गुनगुना कर इसकी मालिश करने से हर  प्रकार का बदन का दर्द दूर हो जाता है।  2 -. लहसुन की एक कली छीलकर सुबह एक गिलास पानी से निगल लेने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर  नियंत्रित रहता है साथ ही ब्लडप्रेशर भी  कंट्रोल में रहता है।  3 - लहसुन डायबिटीज के रोगियो...

पसीने की दुर्गन्ध से पाये छुटकारा

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स्वास्थ्य के लिए पसीना महत्वपूर्ण है क्योंकि जब वातावरण का तापमान बढ़ता है तब शरीर के तापमान को संतुलित करने के लिए पसीना आता है अन्यथा त्वचा रुखी हो जायेगी। गर्मियों के दिनों में पसीना आना स्वाभाविक है लेकिन उसकी दुर्गंध असहनीय होती है जिससे हर कोई मुक्ति चाहता है। गर्मियों में तो पसीना बहुत अधिक आता है। गर्मियों में जैसे - जैसे तापमान बढ़ता जाता है , वैसे - वैसे शरीर में रक्त का ताप भी क्रमशः बढ़ता जाता है।  इस ताप को नियंत्रित करने के लिए स्वेद ग्रंथियां ज्यादा पसीने का स्राव करने लगती है। स्वेद ग्रंथियों का कार्य हमारे शरीर के लाभ के लिए ही है। वे पसीने के रूप में गन्दगी बाहर निकालने का कार्य करती है।  लेकिन इससे भी अधिक परेशानी का कारण है पसीने की दुर्गन्ध। त्वचा पर मौजूद जीवाणु पसीने को सड़ाकर दुर्गन्धयुक्त बना देते हैं । कपड़ो  पर पसीने का दाग दिखने में बहुत भद्दा लगता है, लेकिन क्‍या करें गर्मी इतनी पड़ रही है कि आप पसीने को बहने से नहीं रोक सकतीं।  शरी र की अच्छी तरह सफाई न होने पर स्वेद छिद्रों के बन्द हो जाने से तथा धूल के साथ त्वचा पर जमे जीवाणुओं के गतिशी...