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जहाँ भी तू है लौटके आ जा

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कितना प्यार है तुझसे माँ! बस मैं कह नहीं पाता था। बहुत बुरा हूँ, बात-बात में तेरा दिल दुखाता था।। भीगे-भीगे नैन लिए, दिन-रात अब आहें भरता हूँ। जहाँ भी तू है लौटके आ जा, मैं फ़रियाद करता हूँ।। आज तो इतना तन्हा हूँ मैं, हर तरफ़ है तन्हाई। इस क़दर तू दूर गई, फिर कभी लौटकर न आई।। इन दिनों ये हाल है मेरा, अपने आपसे डरता हूँ। जहाँ भी तू है लौटके आ जा, मैं फ़रियाद करता हूँ।। गले लगाके करती थी, प्यार ज़ाहिर, आए दिन। मुझे याद है तू रोती थी, मेरी ख़ातिर, आए दिन।। आज तो मैं, हाय-हाय! उसी प्यार को मरता हूँ। जहाँ भी तू है लौटके आ जा, मैं फ़रियाद करता हूँ।। दुआ है मेरी मौला से, मुक़म्मल जहाँ सबको दे। हाँ ऐ काश! वो तेरी जैसी, प्यारी माँ सबको दे। मैं तो ऐसा टूट गया हूँ, जुड़ने से भी डरता हूँ। जहाँ भी तू है लौटके आ जा, मैं फ़रियाद करता हूँ।। # यमित पुनेठा

ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता,...!!!

ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता, मैं तुझसे जुदा होके भी तन्हा नहीं होता। इस मोड़ के आगे भी कई मोड़ हैं वर्ना, यूं मेरे लिए तू कभी ठहरा नहीं होता। क्यों मेरा मुकद्दर है उजालों की सियाही, क्यों रात के ढलने पे सवेरा नहीं होता। या इतनी न तब्दील हुई होती ये दुनिया, या मैंने इसे ख्वाब में देखा नहीं होता। सुनते हैं सभी गौर से आवाजे-जरस को, मंजिल की तरफ कोई रवाना नहीं होता। दिल तर्के-तआल्लुक पे भी आमादा नहीं है, और हक भी अदा इससे वफा का नहीं होता। #  शहरयार

जिस्मे-सदपाक भी आईना दिखाता है मुझे

दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे, फिर भी उस शख्स में क्या-क्या नजर आता है मुझे। सारी आवाजों को सन्नाटे निगल जाएंगे, कब से रह-रह के यही खौफ सताता है मुझे। ये अलग बात है कि दिन में तुझे रखता है निढाल, रात की जद से तो सूरज ही बचाता है मुझे। इक नए कहर के इमकान से बोझल है फजा, आसमां धुंध में लिपटा नजर आता है मुझे। तज्किरा इतना हुआ रूह की आलूदगी का, जिस्मे-सदपाक भी आईना दिखाता है मुझे | # शहरयार