ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता,...!!!
ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता,
मैं तुझसे जुदा होके भी तन्हा नहीं होता।
इस मोड़ के आगे भी कई मोड़ हैं वर्ना,
यूं मेरे लिए तू कभी ठहरा नहीं होता।
क्यों मेरा मुकद्दर है उजालों की सियाही,
क्यों रात के ढलने पे सवेरा नहीं होता।
या इतनी न तब्दील हुई होती ये दुनिया,
या मैंने इसे ख्वाब में देखा नहीं होता।
सुनते हैं सभी गौर से आवाजे-जरस को,
मंजिल की तरफ कोई रवाना नहीं होता।
दिल तर्के-तआल्लुक पे भी आमादा नहीं है,
और हक भी अदा इससे वफा का नहीं होता।
# शहरयार
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