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Showing posts with the label धर्म /अध्यातम

बनियागीरी छोडो ?

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कई लोगो को देखा हैं ,राम ,अल्लाह या वाहे गुरु का नाम लेते समय गिनती करके लेते हैं ,जैसे उस पे बड़ा अहसान कर रहे हैं :). कई लोग मालाएं घुमाते हैं तो कई पेन से कोपी में लिखते हैं ,पर गिनती के बड़े पक्के हैं ,कितने नाम लिए कितने लेने हैं पूरा हिसाब किताब रखते हैं . सकाम भाव से साधना करने वालो ,तंत्र के साधको के लिए गिनती मायने रखती हैं क्यूँ कि उनको क्या प्राप्त करना हैं वो पहले से तय होता हैं ,वे लोग किसी विशेष सिद्धि या काम में सफलता के लिए निश्चित संख्या में पुरश्चरण करते हैं . निष्काम भाव या ईश्वर प्राप्ति करने के लिए माला या गिनती अवरोधक हैं . कहा भी  गया हैं "माला तो मन की भली और काठ का भारा ,जो माला में गुण होवे तो क्यूँ बेचें मनिहारा " पर शुरुआती अवस्था मैं ये चीज़ समझ नहीं आती .विभिन्न तरह के लोग और सबके अलग अलग विचार किसको सही माने किसको गलत . एक कहानी के द्वारा अपनी बात रखना चाहूँगी -एक साधू १०८ मनियो की माला लेकर अपने इष्ट देवता के मन्त्र का पुरश्चरण करता था .सुबह नहा धोकर दूध पीकर मंत्र का जप शुरू करता सो दोपहर तक चलता ,भोजन करने के बाद फिर से जप शुरू ,यही क्रम रात को...

कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्"

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  ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।   जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस अद्भुत रचना के रचने वाले श्री वेंकटाध्वरि का जन्म कांचीपुरम के एक गांव अरसनीपलै में हुआ था। इन्होंने कुल 14 रचनाएं लिखी हैं जिनमें से "राघवयादवीयम्" और "लक्ष्मीसहस्त्रम्" सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। वेंकटाध्वरि श्री वेदांत देशिक के शिष्य थे जिन्होंने इनको शास्त्रों की शिक्षा दी। वेदांत देशिक ने ही श्री रामनुजमाचार्य द्वारा स्थापित रामानुज सम्प्रदाय को वेडगलई गुट के द्वारा आगे बढ़ाया। बचपन में ही दृष्टि दोष से बाधित होने के बावजूद वे मेधावी वकुशाग्र बुद्धि के धनी थे। उन्होंने वेदान्त देशिक का, जिन्हें वेंकटनाथ (1269–1370) के नाम से भी जाना जाता है तथा जिनकी "पादुका सहस्रम्" नामक रचना चित्रकाव्य की अनुपम् भेंट है, अनुयायी बन काव्यशास्त्र में महारत हासिल ...

◆||#सुर_संगीत||◆

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"अकबर" के दरबार मे कला प्रेमियों का जमावड़ा रहता था, 9 रत्नों में एक थे तानसेन। "तानसेन" "गुरु हरिदास" के शिष्य थे, वही "गुरु हरिदास" जिन्होंने अपनी सुरों की साधना से बिहारी जी को पुनः प्रकट कर दिया था और उन्हें विवश किया वृंदावन के निधिवन में रहने को। "अकबर" एक दिन "तानसेन" का संगीत सुनकर इतने मंत्रमुग्ध हुए की उन्होंने आगरा में यह घोषणा करवग दी की "तानसेन" के अतिरिक्त कोई भी गाना नही गायेगा, अन्यथा उसे "तानसेन" के लिए चुनौती समझा जाएगा और यदि उसने "तानसेन" को नही हराया तो उसे मृत्यु दंड दे दिया जाएगा। एक दिन साधुओं की एक टोली सुबह सुबह भजन गाती बांके बिहारी के दर्शनों के लिए जा रही थी। आगरा के निकट से जब वे लोग गुजरे तो सिपाहियों ने उन साधुओं को पकड़ लिया और कहा,"क्या, तुम्हें मृत्यु का भय नही है, जो गाना गा रहे हो.? चलो अब बादशाह के दरबार में।" साधु घबराए मगर क्या करें जाना तो था ही सो चल पड़े दरबार की ओर। अकबर ने पूछा, "इनको दरबार मे क्यों लाया गया ?" सिपाहियों ने कारण बताया त...

सरकारी नौकरियाँ से दलितों का उत्थान .... ?

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दलित शब्द के साथ ही एक और शब्द आ जाता है और वो है आरक्षण ! पिछड़े हुए लोगों को हमेशा के लिए पिछड़ा बना देने वाली साजिश ! मैं जानती हूँ आपको मेरी इस बात से गम्भीर आपत्ति होगी । इसीलिए मैं चाहती हूँ कि एक बार आप इस आरक्षण का ध्यान से विश्लेषण करें । एक उदाहरण से इस मुद्दे को शुरू करते हैं । मैं जब कॉलेज में पहुंची तो कॉलेज प्रवेश परीक्षा में मेरे अंक थे 606 / 900 । मेरे साथ मेरे ही क्लास में एक और लड़का था उसके प्रवेश परीक्षा में कुल अंक थे 50 / 900 । जबकि उसी दौर में सामान्य श्रेणी के हजारों छात्र ऐसे रहे होंगे जिन्होंने 50 से कहीं अधिक अंक लाए लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिला । मैं जानती हूँ कि अभी आप इमोश्नल बातें करेंगे कि दलितों पर हजारों वर्षों से अत्याचार हो रहे हैं आज भी हो रहे हैं । बहुत सारी बातें ! मैं एकदम सहमत हूँ कि आप पर बहुत अत्याचार हुआ है । आज भी हो रहा है । सब मान लिया । यह भी मान लिया कि उसे ऐसी कोई कोचिंग की सुविधा नहीं मिली जो दूसरे बच्चों को मिली । लेकिन ! क्या आपको यह नहीं लगता कि यह अयोग्यता पर योग्यता का ठप्पा लगा देने जैसा है ? क्या आपको वाकई यह लगता है कि 900 में 50...

कार्तवीर्य नाम राजा बाहु सहस्रवान ....

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अकसर हिन्दू जन ने भगवान कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का नाम केवल भगवानपरशुराम और उनके बीच होने वाले युद्ध के लिये सुना है और रही सही कसर आजकल के खासतौर से यूपी बिहार के हिन्दुओ के डीएनए मे घुली जातिवादिता के कारण यूपी बिहार के ब्राह्मण युवाओ के "जय परशुराम" के नारे की मूल कथा के विलेन के रूप मे जानते हैं| रही सही कसर हरियाणे के "जय दादा परसुराम "गैंग करे दे रही है| पर यह  कथा इन उपरोक्त अति मूर्खताओ के अलावा बहुत कुछ है चन्द्र वंशीय कृतवीर्य के सुयोग्य पुत्र होने से कार्तवीर्य कहलाये गये अर्जुन जो अपने सहस्र नौकादल के कारण सहस्रभुजा धारी माने गये और "कार्तवीर्य सहस्रार्जुन " कहलाये भारतीय सनातन मे आठ राजन्यो को मानक कहा गया है मतलब ये की उनके राज्य मे शासन व्यवस्था बिलकुल चाकचौबंद रहती थी ,प्रजा प्रसन्न और तुष्ट , कर न्युनतम, डाकू चोर का दमन और शत्रु का मर्दन ये सब गुण रहते थे इनके शासन का पैमाना बहुत पहले दतिया के संस्कृत गुरूकुल के एक छात्र से सुना था संस्कृत श्लोक केरूप मे जिसका अर्थ था की जहां एक पूर्णयौवना नारी रत्नाभूषणो से लदी हुई हो वह आधीरात मे विजन वन ...

भगवान शिव का दूसरा घर....उनाकोटि त्रिपुरा

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त्रिपुरा, नार्थ ईस्ट भारत का एक राज्य...! त्रिपुरा की राजधानी से 177 किमी दूर उनाकोटी का जंगल जो कहलाता हैभगवान शिव का दूसरा घर... टेढ़ी मेढ़ी खूबसूरत पगडंडियां, सुंदर-घने जंगल, घाटियां, संकरी कल-कल बहती नदियां और झरने... उनाकोटी एक औसत ऊंचाई वाली पहाड़ी श्रृंखला है जहाँ आठवीं नवीं सदी की हिन्दू देवी-देवताओं की चट्टानों पर अनगिनत मूर्तियां उकेरी गई हैं, जो अब भी मौजूद हैं... उनाकोटि का अर्थ है एक करोड़ से एक कम... एक दंत कथा के अनुसार यहाँ शिव की एक करोड़ में एक मूर्ति कम है, इस कारण इसका नाम ‘उनाकोटी’ पड़ा.. उनाकोटि उनाकोटि उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा . यहाँ 30 फुट ऊंचे शिव की विशालतम छवि एक खड़ी चट्टान पर उकेरी गई है, जिसे ‘उनाकोटिस्वर काल भैरव’ कहा जाता है... इसके सिर को 10 फीट तक के लंबे बालों के रूप में उकेरा गया है... इसी मूर्ति के पास शेर पर सवार माता दुर्गा का शिल्प चट्टान पर उकेरा गया है वहीं दूसरी तरफ मकर पर सवार देवी गंगा का शिल्प भी है... ...