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◆||#सुर_संगीत||◆

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"अकबर" के दरबार मे कला प्रेमियों का जमावड़ा रहता था, 9 रत्नों में एक थे तानसेन। "तानसेन" "गुरु हरिदास" के शिष्य थे, वही "गुरु हरिदास" जिन्होंने अपनी सुरों की साधना से बिहारी जी को पुनः प्रकट कर दिया था और उन्हें विवश किया वृंदावन के निधिवन में रहने को। "अकबर" एक दिन "तानसेन" का संगीत सुनकर इतने मंत्रमुग्ध हुए की उन्होंने आगरा में यह घोषणा करवग दी की "तानसेन" के अतिरिक्त कोई भी गाना नही गायेगा, अन्यथा उसे "तानसेन" के लिए चुनौती समझा जाएगा और यदि उसने "तानसेन" को नही हराया तो उसे मृत्यु दंड दे दिया जाएगा। एक दिन साधुओं की एक टोली सुबह सुबह भजन गाती बांके बिहारी के दर्शनों के लिए जा रही थी। आगरा के निकट से जब वे लोग गुजरे तो सिपाहियों ने उन साधुओं को पकड़ लिया और कहा,"क्या, तुम्हें मृत्यु का भय नही है, जो गाना गा रहे हो.? चलो अब बादशाह के दरबार में।" साधु घबराए मगर क्या करें जाना तो था ही सो चल पड़े दरबार की ओर। अकबर ने पूछा, "इनको दरबार मे क्यों लाया गया ?" सिपाहियों ने कारण बताया त...

मौर्य, नन्द और गुप्त सबसे अधिक शक्तिशाली राजवंश उच्च जातियों से नहीं थे ...

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चलिए अब राजनीति से थोड़ा आगे बढ़ते हुए राष्ट्रनीति पर ध्यान देते हैं । हमारा संविधान बताता है कि सभी भारतीय एक बराबर हैं और फिर उसी में थोड़ा आगे जा कर दलित और अल्प-संख्यक जैसे शब्दों का प्रयोग हो जाता है । अब साधारण शब्दों में कहूँ तो हमारा संविधान ही हमें एक  बराबर नहीं मानता ।  जब आपने कह दिया कि सभी एक बराबर हैं तो फिर अलग से दलित और अल्प-संख्यक शब्द लिखने की आवश्यकता ही क्या थी ? मतलब आपने उसके पहले जो कुछ लिखा है आपको खुद में उस पर विश्वास नहीं है कि उसका पालन होगा । यही ना ? अच्छा ! ये जो दलित शब्द है देखने पर बड़ा ही सामाजिक शब्द दिखाई पड़ता है लेकिन वास्तव में ये पूर्णतया राजनीतिक शब्द है ।  भारत की जाति व्यवस्था के विषय में एक टिप्पणी पढ़ी थी मैंने । किसी विदेशी की टिप्पणी थी । कि ‘भारत में नीच से नीच जाति भी अपने से नीच जाति खोज लेती है’ ।  व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि ना तो कोई जाति नीची होती है और ना कोई ऊंची । सबका अपना-अपना काम है । और यही जाति-व्यवस्था के मूल में था । एक उदाहरण से समझते हैं । मान लीजिए आपके क्षेत्र में नाली की सफाई करने वाले कर्मचारियो...

सरकारी नौकरियाँ से दलितों का उत्थान .... ?

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दलित शब्द के साथ ही एक और शब्द आ जाता है और वो है आरक्षण ! पिछड़े हुए लोगों को हमेशा के लिए पिछड़ा बना देने वाली साजिश ! मैं जानती हूँ आपको मेरी इस बात से गम्भीर आपत्ति होगी । इसीलिए मैं चाहती हूँ कि एक बार आप इस आरक्षण का ध्यान से विश्लेषण करें । एक उदाहरण से इस मुद्दे को शुरू करते हैं । मैं जब कॉलेज में पहुंची तो कॉलेज प्रवेश परीक्षा में मेरे अंक थे 606 / 900 । मेरे साथ मेरे ही क्लास में एक और लड़का था उसके प्रवेश परीक्षा में कुल अंक थे 50 / 900 । जबकि उसी दौर में सामान्य श्रेणी के हजारों छात्र ऐसे रहे होंगे जिन्होंने 50 से कहीं अधिक अंक लाए लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिला । मैं जानती हूँ कि अभी आप इमोश्नल बातें करेंगे कि दलितों पर हजारों वर्षों से अत्याचार हो रहे हैं आज भी हो रहे हैं । बहुत सारी बातें ! मैं एकदम सहमत हूँ कि आप पर बहुत अत्याचार हुआ है । आज भी हो रहा है । सब मान लिया । यह भी मान लिया कि उसे ऐसी कोई कोचिंग की सुविधा नहीं मिली जो दूसरे बच्चों को मिली । लेकिन ! क्या आपको यह नहीं लगता कि यह अयोग्यता पर योग्यता का ठप्पा लगा देने जैसा है ? क्या आपको वाकई यह लगता है कि 900 में 50...

कार्तवीर्य नाम राजा बाहु सहस्रवान ....

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अकसर हिन्दू जन ने भगवान कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का नाम केवल भगवानपरशुराम और उनके बीच होने वाले युद्ध के लिये सुना है और रही सही कसर आजकल के खासतौर से यूपी बिहार के हिन्दुओ के डीएनए मे घुली जातिवादिता के कारण यूपी बिहार के ब्राह्मण युवाओ के "जय परशुराम" के नारे की मूल कथा के विलेन के रूप मे जानते हैं| रही सही कसर हरियाणे के "जय दादा परसुराम "गैंग करे दे रही है| पर यह  कथा इन उपरोक्त अति मूर्खताओ के अलावा बहुत कुछ है चन्द्र वंशीय कृतवीर्य के सुयोग्य पुत्र होने से कार्तवीर्य कहलाये गये अर्जुन जो अपने सहस्र नौकादल के कारण सहस्रभुजा धारी माने गये और "कार्तवीर्य सहस्रार्जुन " कहलाये भारतीय सनातन मे आठ राजन्यो को मानक कहा गया है मतलब ये की उनके राज्य मे शासन व्यवस्था बिलकुल चाकचौबंद रहती थी ,प्रजा प्रसन्न और तुष्ट , कर न्युनतम, डाकू चोर का दमन और शत्रु का मर्दन ये सब गुण रहते थे इनके शासन का पैमाना बहुत पहले दतिया के संस्कृत गुरूकुल के एक छात्र से सुना था संस्कृत श्लोक केरूप मे जिसका अर्थ था की जहां एक पूर्णयौवना नारी रत्नाभूषणो से लदी हुई हो वह आधीरात मे विजन वन ...

भगवान शिव का दूसरा घर....उनाकोटि त्रिपुरा

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त्रिपुरा, नार्थ ईस्ट भारत का एक राज्य...! त्रिपुरा की राजधानी से 177 किमी दूर उनाकोटी का जंगल जो कहलाता हैभगवान शिव का दूसरा घर... टेढ़ी मेढ़ी खूबसूरत पगडंडियां, सुंदर-घने जंगल, घाटियां, संकरी कल-कल बहती नदियां और झरने... उनाकोटी एक औसत ऊंचाई वाली पहाड़ी श्रृंखला है जहाँ आठवीं नवीं सदी की हिन्दू देवी-देवताओं की चट्टानों पर अनगिनत मूर्तियां उकेरी गई हैं, जो अब भी मौजूद हैं... उनाकोटि का अर्थ है एक करोड़ से एक कम... एक दंत कथा के अनुसार यहाँ शिव की एक करोड़ में एक मूर्ति कम है, इस कारण इसका नाम ‘उनाकोटी’ पड़ा.. उनाकोटि उनाकोटि उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा उनाकोटि त्रिपुरा . यहाँ 30 फुट ऊंचे शिव की विशालतम छवि एक खड़ी चट्टान पर उकेरी गई है, जिसे ‘उनाकोटिस्वर काल भैरव’ कहा जाता है... इसके सिर को 10 फीट तक के लंबे बालों के रूप में उकेरा गया है... इसी मूर्ति के पास शेर पर सवार माता दुर्गा का शिल्प चट्टान पर उकेरा गया है वहीं दूसरी तरफ मकर पर सवार देवी गंगा का शिल्प भी है... ...

नाम और परम्परा सँजोए रखने का माहात्म्य ...अयोध्या, प्रयागराज, ज्ञानवापी

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. 435 वर्ष से हिन्दू जनमानस ने अयोध्या, प्रयागराज, ज्ञानवापी आदि नाम याद रखा ... कभी लेखों में, कविताओं में, श्लोकों में, परम्पराओं में ... जो कहे कि परम्परा, मान्यताएँ और वर्षों पुरानी चीज़ याद रखने में क्या फायदा .. जो आपकी मान्यताओं पर चोट करे उसके मुंह पर फेंक के मार दीजिए ...अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे ... . इस गद्य ने अयोध्या धाम को फैज़ाबाद में बचा के रखा काशीनाथ गँगा बड़ी न गोदावरी, न तीर्थराज प्रयाग .. सबसे बड़ी अयोध्या नगरी, जहाँ राम लिए अवतार ... . पुराण के इस श्लोक ने प्रयागराज के कुम्भ परंपरा को न भूलने दिया . प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यत्फलम्। ... नाश्वमेधसस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि।। . काशी में औरंगज़ेब द्वारा महादेव का मंदिर तोड़ने के बाद भी ज्ञान वापी नाम को रखा हुआ है ... मस्जिद को ज्ञानवापी बुलाते हैं जिससे पता रहे कि मंदिर को तोड़ कर ही ये बना है ... ज्ञानवापी को जाने लें| . एक पोस्ट पर किसी मित्र ने कमेण्ट किया कि ... ज्ञानवापी तो मस्जिद का नाम है ... ये कमेंट मेरे लिए कोई अचंभित करने वाली बात नहीं है .. दरअसल लोगों के त्वरित के प्रकटीकरण की बात है .. सोच ही कभी नहीं...

शाह दुले साहब के चूहे - मंटो

# शाह_दुले_साहब_के_चूहे सलीमा की जब शादी हुई तो वो इक्कीस बरस की थी। पाँच बरस होगए मगर उसके औलाद न हुई। उसकी माँ और सास को बहुत फ़िक्र थी। माँ को ज़्यादा थी कि कहीं उसका नजीब दूसरी शादी न करले। चुनांचे कई डाक्टरों से मश्वरा किया गया मगर कोई बात पैदा न हुई। सलीमा बहुत मुतफ़क्किर थी। शादी के बाद बहुत कम लड़कियां ऐसी होती हैं जो औलाद की ख़्वाहिशमंद न हो। उसने अपनी माँ से कई बार मश्वरा किया। माँ की हिदायतों पर भी अमल किया। मगर नतीजा सिफ़र था। एक दिन उसकी एक सहेली जो बांझ क़रार दे दी गई थी, उसके पास आई। सलीमा को बड़ी हैरत हुई कि उसकी गोद में एक गुल गोथना लड़का था। सलीमा ने उससे बड़े बेंडे अंदाज़ में पूछा, “फ़ातिमा तुम्हारे ये लड़का कैसे पैदा होगया।” फ़ातिमा उससे पाँच साल बड़ी थी। उस ने मुस्कुरा कर कहा, "ये शाह दूले साहब की बरकत है। मुझ से एक औरत ने कहा कि अगर तुम औलाद चाहती हो तो गुजरात जाकर शाह दूले साहब के मज़ार पर मन्नत मानो। कहो कि हुज़ूर मेरे जो पहले बच्चा होगा वो आप की ख़ानक़ाह पर चढ़ा दूंगी।" उसने ये भी सलीमा को बताया कि जब शाह दूले साहब के मज़ार पर ऐसी मन्नत मानी जाये तो पहला बच्चा ऐसा होता है...