नाम और परम्परा सँजोए रखने का माहात्म्य ...अयोध्या, प्रयागराज, ज्ञानवापी



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435 वर्ष से हिन्दू जनमानस ने अयोध्या, प्रयागराज, ज्ञानवापी आदि नाम याद रखा ... कभी लेखों में, कविताओं में, श्लोकों में, परम्पराओं में ... जो कहे कि परम्परा, मान्यताएँ और वर्षों पुरानी चीज़ याद रखने में क्या फायदा .. जो आपकी मान्यताओं पर चोट करे उसके मुंह पर फेंक के मार दीजिए ...अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे ...
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इस गद्य ने अयोध्या धाम को फैज़ाबाद में बचा के रखा


ज्ञानवापी मस्जिद काशी मंदिर के लिए इमेज परिणाम
काशीनाथ

गँगा बड़ी न गोदावरी, न तीर्थराज प्रयाग ..
सबसे बड़ी अयोध्या नगरी, जहाँ राम लिए अवतार ...
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पुराण के इस श्लोक ने प्रयागराज के कुम्भ परंपरा को न भूलने दिया
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प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यत्फलम्। ...
नाश्वमेधसस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि।।
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काशी में औरंगज़ेब द्वारा महादेव का मंदिर तोड़ने के बाद भी ज्ञान वापी नाम को रखा हुआ है ... मस्जिद को ज्ञानवापी बुलाते हैं जिससे पता रहे कि मंदिर को तोड़ कर ही ये बना है ... ज्ञानवापी को जाने लें|
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एक पोस्ट पर किसी मित्र ने कमेण्ट किया कि ... ज्ञानवापी तो मस्जिद का नाम है ... ये कमेंट मेरे लिए कोई अचंभित करने वाली बात नहीं है .. दरअसल लोगों के त्वरित के प्रकटीकरण की बात है .. सोच ही कभी नहीं बनी अधिकाधिक लोगों की कि ... "ज्ञानवापी" ये तो संस्कृत का शब्द है .. इससे उर्दू, अरबी, फ़ारसी, तुर्की, मंगोल आदि से क्या लेना देना .. वो मुग़ल लोग मस्जिद का नाम ज्ञान वापी क्यों रखेंगे ... दरअसल हमने सुनी सुनाई बातों पर बहुत ज्ञान पाला हुवा है .. उस ज्ञान की सत्यता परखने के लिए उसे कसौटी पर कभी परखा ही नहीं हैं .... और कोई बात नहीं है |
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ज्ञानवापी कुँआ
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तो ज्ञानवापी क्या है ये जानते हैं .. जो असली मंदिर है उसमे एक कुँआ है जिसका नाम है "ज्ञानवापी" .. "ज्ञानवापी" मतलब होता है "ज्ञान का भंडार" अथवा "ज्ञान का कुआँ ..." तो ज्ञानवापी किसी का नाम नहीं है .... एक जगह जहाँ अद्भुत ज्ञान का संचार होता है क्योंकि आप देवाधिदेव महादेव के सन्निद्ध में रहते है ... औरंगजेब ने उसी कुवें में शिवलिंग को फेंकवा दिया गया था ... और मन्दिर परिसर को तोड़कर मस्जिद बनाया था ... इसलिए उस परिसर को ज्ञानवापी मस्जिद कहते हैं ..... उस मस्जिद का अलसी नाम जो औरंगज़ेब के जमाने में दिया गया वो था "अंजुमन इन्तहाज़ामिया ज़ामा मस्जिद " .... ..... काशी के लोगों ने उसको "ज्ञानवापी मस्जिद" बोल कर .. "ज्ञानवापी" को जिन्दा रखा|
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उसके आगे की बात ये है कि मराठा राजा मल्हार राव होलकर ने काशी में "अंजुमन इन्तहाज़ामिया मस्जिद" के जगह पर वापस ज्ञानवापी मन्दिर बनवाने का फैसला किया .. लेकिन लखनऊ के नवाबों ने उसका विरोध किया ... महाराज होलकर इन लखनऊ के नवाबों के हठ से कोई हल नहीं निकाल सके .. उनके बाद उनकी पुत्र वधू अहिल्याबाई होलकर ने मस्जिद के बगल वाला मंदिर बनवाया जिसमे आज लोग दर्शन के लिए जाते हैं ... इनके नाम से एक घाट अहिल्याभाई होलकर घाट भी है |

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