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बनियागीरी छोडो ?

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कई लोगो को देखा हैं ,राम ,अल्लाह या वाहे गुरु का नाम लेते समय गिनती करके लेते हैं ,जैसे उस पे बड़ा अहसान कर रहे हैं :). कई लोग मालाएं घुमाते हैं तो कई पेन से कोपी में लिखते हैं ,पर गिनती के बड़े पक्के हैं ,कितने नाम लिए कितने लेने हैं पूरा हिसाब किताब रखते हैं . सकाम भाव से साधना करने वालो ,तंत्र के साधको के लिए गिनती मायने रखती हैं क्यूँ कि उनको क्या प्राप्त करना हैं वो पहले से तय होता हैं ,वे लोग किसी विशेष सिद्धि या काम में सफलता के लिए निश्चित संख्या में पुरश्चरण करते हैं . निष्काम भाव या ईश्वर प्राप्ति करने के लिए माला या गिनती अवरोधक हैं . कहा भी  गया हैं "माला तो मन की भली और काठ का भारा ,जो माला में गुण होवे तो क्यूँ बेचें मनिहारा " पर शुरुआती अवस्था मैं ये चीज़ समझ नहीं आती .विभिन्न तरह के लोग और सबके अलग अलग विचार किसको सही माने किसको गलत . एक कहानी के द्वारा अपनी बात रखना चाहूँगी -एक साधू १०८ मनियो की माला लेकर अपने इष्ट देवता के मन्त्र का पुरश्चरण करता था .सुबह नहा धोकर दूध पीकर मंत्र का जप शुरू करता सो दोपहर तक चलता ,भोजन करने के बाद फिर से जप शुरू ,यही क्रम रात को...

वास्कोडिगामा ने स्वयं से भारत नही खोजा

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 अंग्रेजों ने एक भ्रम और व्याप्त किया कि वास्कोडिगामा ने समुद्र मार्ग से भारत आने का मार्ग खोजा। यह सत्य है कि वास्कोडिगामा भारत आया था, पर वह कैसे आया इसके यथार्थ को हम जानेंगे तो स्पष्ट होगा कि वास्तविकता क्या है? प्रसिद्ध पुरातत्ववेता पद्मश्री डा. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने बताया कि मैं अभ्यास के लिए इंग्लैण्ड गया था। वहां एक संग्रहालय में मुझे वास्कोडिगामा की डायरी के संदर्भ में बताया गया। इस डायरी में वास्कोडिगामा ने वह भारत कैसे आया, इसका वर्णन किया है। वह लिखता है, जब उसका जहाज अफ्रीका में जंजीबार के निकट आया तो मेरे से तीन गुना बड़ा जहाज मैंने देखा । तब एक अफ्रीकन दुभाषिया लेकर वह उस जहाज के मालिक से मिलने गया। जहाज का मालिक चंदन नाम का एक गुजराती व्यापारी था, जो भारतवर्ष से चीड़ व सागवान की लकड़ी तथा मसाले लेकर वहां गया था और उसके बदले में हीरे लेकर वह कोचीन के बंदरगाह आकार व्यापार करता था। वास्कोडिगामा जब उससे मिलने पहुंचा तब वह चंदन नाम का व्यापारी सामान्य वेष में एक खटिया पर बैठा था। उस व्यापारी ने वास्कोडिगामा से पूछा, कहां जा रहे हो? वास्कोडिगामा ने कहा- भारत...

इस्लाम के अब तक के नबियों का लेखा जोखा

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यह एक स्थापित सत्य है कि पिस्लाम का कांसेप्ट आज से लगभग 1400 साल पहले महामद ने लाया था. लेकिन, देश और दुनिया के संबंध में महज 1400 साल बेहद ही कम होता है और इससे उन्हें काफी नया एवं हल्का माना जाता. इसीलिए, उन्होंने अपने मजहब में वजन लाने के लिए अफवाह उड़ा दिया कि... हमलोग भी काफी पुराने मजहब हैं. और, कहना शुरू कर दिया कि.... दुनिया की शुरुआत ही हमारे मजहब से हुई है. इसके लिए उन्होंने... एक शिगूफा छोड़ दिया कि... हमारे महामद तो सबसे अंतिम नबी थे और मजहब में एक नहीं बल्कि 1,24,000 हुए हैं. आप दुनिया के किसी भी कटेशर से पूछ के देखो तो शान से छाती फुलाकर बताएगा कि उसके तो 1,24,000 नबी हुई हैं आजतक. अब ये बात अलग है कि... अगर आप किसी भी कटेशर से उन तथाकथित 1,24,000 नबियों में से 10-12 नबियों के नाम भी पूछोगे तो वो अपनी बीबियों के बुर्के में मुँह छुपा कर भाग जाएगा. खैर.... हमलोग भी उनके बाप हैं और उनका इतिहास खोद कर निकाल लाने में सिद्धहस्त हैं इसीलिए... आज उन्हीं की कही बात को मानते हुए इस बात का पोस्टमार्टम करते हैं. और, आज पिस्लाम की ही कुछ दबी हुई किताबों से इस बात का जिंदा सब...

धरती की उत्पति के साथ इस्लाम आया तो फिर ये क्यो?

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 चलो भाई माना जब से धरती पर मानव जाति है तब से इस्लाम है , पर ये बताओ भारत मे मुस्लिम 30%  और सनातनी 100  करोड़ कैसे हुए ??? क्या कोई बुराई थी इस्लाम मे जो 130 करोड़ मुस्लिम में से 100 करोड़ ने हिन्दू धर्म अपना लिया??? दुनिया में 6 प्रकार की कुरान है सभी कुरान एक दूसरे से अलग अलग है और उनकी आयतो की संख्या भी अलग अलग है और सभी कुरान को मानने वाले एक दूसरे की कुरान को ग़लत कहते है......कोई आप बतला सकते है निम्लिखित इन 6 कुरान में से असली कुरान कौन सी है......?? 1. कूफी कुरान...आयत 6236 2. बशरी कुरान...आयात 6216 3. शयामि कुरान...आयत 6250 4. मक्की कुरान...आयत 6212 5. ईराकी कुरान...आयत 6214 6. साधारण कुरान (आम कुरान)...आयत 6666 सबके पूर्वज हजरत आदम है ।  तो ये  (1) एक भी नदी का नाम शबनम ,शबाना , रुखसाना नही रख पाए ? क्योंकि आदिकाल से गंगा यमुना नर्मदा जैसी अनेको नदिया है। (2) एक भी पर्वत का नाम अब्दुल ,सलीम ,नही रख पाए ? क्योंकि आदिकाल से हिमालय ,नीलगिरी जैसे अनेको पर्वत है। (4) पीपल बरगद जैसे अनेको पेड़ो के नाम उर्दू में क्यों नही ? ( 5) तुलसी ,अर...

इस्लाम का वास्तविक पुरातन यतार्थ

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प्राचीन कालीन अरबों के प्रधान तीर्थ मक्का का भी बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। शायर-उल-ओकुल की भूमिका में मक्का में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित होने वाले वार्षिक मेले "ओकाज़" का वर्णन है। स्मरण रहे, वर्तमान प्रचलित वार्षिक हज-यात्रा भी कोई इस्लामी विशेषता नहीं है, अपितु प्रागैस्लामी "ओकाज" (धार्मिक मेला) का ही परिवर्तित रूप है। इस मेले का मुख्य आकर्षण मक्का के मुख्य मन्दिर मक्केश्वर महादेव (अब ‘अल-मस्जि़द-अल-हरम') के प्रांगण में होने वाला एक सारस्वत कवि सम्मेलन था, जिसमें सम्पूर्ण अर्वस्थान से आमन्त्रित कवि काव्य पाठ करते थे। ये कविताएँ पुरस्कृत होती थीं। सर्वप्रथम कवि की कविता को स्वर्ण पत्र पर उत्कीर्ण कर मक्केश्वर महादेव मन्दिर के परमपावन गर्भगृह में लटकाया जाता था। द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त कविताओं को क्रमशः ऊँट और भेड़/बकरी के चमड़े पर निरेखित कर मन्दिर की बाहरी दीवारों पर लटकाया जाता था। इस प्रकार अरबी साहित्य का अमूल्य संग्रह हजारों वर्षों से मन्दिर में एकत्र होता चला आ रहा था। यह ज्ञात नहीं है कि यह प्रथा कब प्रारम्भ हुई थी,...

विश्वस्तर पर भारतीया पत्रिकाओं का संघर्ष

भारत में और दुनिया में हिन्दुओं के प्रबोधनार्थ पत्रिका जगत में दो बड़े नाम हैl एक है "पांचजन्य" और दूसरा है "ओर्गेनाईजर"l  इन दोनों पत्रिकाओं का सर्कुकेशन शायद एक-एक लाख या इससे थोड़ी अधिक होगीl "पांचजन्य" हिन्दी में और "ओर्गेनाईजर" अंग्रेजी में छपती है और जहाँ तक मेरी जानकारी है इन पत्रिकाओं का अनुवाद किसी और भाषा में नहीं होता।   अब जरा दूसरी ओर देखते हैं:-  "प्रभु तेरा राज आवे" इस ध्येय वाक्य के साथ ईसाई मिशनरी पत्रिका The Watchtower अपने अभियान में लगी हुई है। दशकों पुरानी यह पत्रिका दुनिया के लगभग हर देश में जाती है 396 भाषाओँ में इसका अनुवाद होता है। 'जेहोवा विटनेस' नाम का संगठन इसे छापता है। ये पत्रिका उतनी संख्या में छपती है, उतना छापना तो दूर हम सोच भी नहीं सकते कि कोई पत्रिका इतनी अधिक संख्या में भी छप सकती है। 930 लाख यानि 9.30 करोड़ कॉपी इसके हर अंक के छपते है। पत्रिका की प्रिंट और पेपर क्वालिटी भी उम्दा होती है।  इस जैसी ही एक पत्रिका और है जिसका नाम है "Awake" । ये पत्रिका भी दुनिया के 221 भाषाओँ में अनुवादि...

सिनेमा की ताकत दिखती फिल्म जय संतोषी माँ

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1975 में आज ही के दिन बॉलीवुड की एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, नाम था जय संतोषी माँ। 15 लाख की लागत से बनी इस फ़िल्म नें बॉक्स ऑफिस पर उस वक्त के भारत मे पाँच से छः करोड़ रुपए कमाए थे। अपने समय में ये शोले के बाद सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। इस फ़िल्म को देखने के लिए लोग सिनेमा हॉल तक बैलगाड़ियों में मीलों की यात्रा करते थे। दर्शक हॉल की सिनेमा स्क्रीन पर फूल औऱ सिक्के फेंकते थे। कई सारे थिएटर, जहां ये फ़िल्म लगी थी, मन्दिर कहलाये जाने लगे थे। जैसे शारदा टॉकीज को शारदा मन्दिर कहा जाने लगा था औऱ बन्द होने तक इस सिनेमा हॉल का नाम शारदा टॉकीज ही रहा। फ़िल्म देखने आने वाले लोग थिएटर के बाहर जूते चप्पल उतारते थे। उस वक्त के कई छोटे सिनेमा हॉल के मालिको नें पैसे कमाने के लिए थिएटर के बार दान पेटियाँ तक रखवा दी थी। दिलचस्प बात ये है कि सन 1975 में जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तो उससे पहले ज्यादातर लोगों ने इस देवी के बारे में सुना तक नहीं था। सन्तोषी माता का जिक्र पुराणों में कहीं भी नहीं है। सन्तोषी माता दरअसल भारत के कुछ गांवों में पूजी जाने वाली ग्राम देवी थी जिनकी मान्यता रोगों के ...