याद करने के लिये उम्र पड़ी हो जैसे ...!!


ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे 


तेरा मिलना भी जुदाई कि घड़ी हो जैसे 




मंज़िलें दूर भी हैं मंज़िलें नज़दीक भी हैं 


अपने ही पावों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे 



कितने नादान हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे 

याद करने के लिये उम्र पड़ी हो जैसे ...!!                                                                




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