Posts

विश्वस्तर पर भारतीया पत्रिकाओं का संघर्ष

भारत में और दुनिया में हिन्दुओं के प्रबोधनार्थ पत्रिका जगत में दो बड़े नाम हैl एक है "पांचजन्य" और दूसरा है "ओर्गेनाईजर"l  इन दोनों पत्रिकाओं का सर्कुकेशन शायद एक-एक लाख या इससे थोड़ी अधिक होगीl "पांचजन्य" हिन्दी में और "ओर्गेनाईजर" अंग्रेजी में छपती है और जहाँ तक मेरी जानकारी है इन पत्रिकाओं का अनुवाद किसी और भाषा में नहीं होता।   अब जरा दूसरी ओर देखते हैं:-  "प्रभु तेरा राज आवे" इस ध्येय वाक्य के साथ ईसाई मिशनरी पत्रिका The Watchtower अपने अभियान में लगी हुई है। दशकों पुरानी यह पत्रिका दुनिया के लगभग हर देश में जाती है 396 भाषाओँ में इसका अनुवाद होता है। 'जेहोवा विटनेस' नाम का संगठन इसे छापता है। ये पत्रिका उतनी संख्या में छपती है, उतना छापना तो दूर हम सोच भी नहीं सकते कि कोई पत्रिका इतनी अधिक संख्या में भी छप सकती है। 930 लाख यानि 9.30 करोड़ कॉपी इसके हर अंक के छपते है। पत्रिका की प्रिंट और पेपर क्वालिटी भी उम्दा होती है।  इस जैसी ही एक पत्रिका और है जिसका नाम है "Awake" । ये पत्रिका भी दुनिया के 221 भाषाओँ में अनुवादि...

सिनेमा की ताकत दिखती फिल्म जय संतोषी माँ

Image
1975 में आज ही के दिन बॉलीवुड की एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, नाम था जय संतोषी माँ। 15 लाख की लागत से बनी इस फ़िल्म नें बॉक्स ऑफिस पर उस वक्त के भारत मे पाँच से छः करोड़ रुपए कमाए थे। अपने समय में ये शोले के बाद सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। इस फ़िल्म को देखने के लिए लोग सिनेमा हॉल तक बैलगाड़ियों में मीलों की यात्रा करते थे। दर्शक हॉल की सिनेमा स्क्रीन पर फूल औऱ सिक्के फेंकते थे। कई सारे थिएटर, जहां ये फ़िल्म लगी थी, मन्दिर कहलाये जाने लगे थे। जैसे शारदा टॉकीज को शारदा मन्दिर कहा जाने लगा था औऱ बन्द होने तक इस सिनेमा हॉल का नाम शारदा टॉकीज ही रहा। फ़िल्म देखने आने वाले लोग थिएटर के बाहर जूते चप्पल उतारते थे। उस वक्त के कई छोटे सिनेमा हॉल के मालिको नें पैसे कमाने के लिए थिएटर के बार दान पेटियाँ तक रखवा दी थी। दिलचस्प बात ये है कि सन 1975 में जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तो उससे पहले ज्यादातर लोगों ने इस देवी के बारे में सुना तक नहीं था। सन्तोषी माता का जिक्र पुराणों में कहीं भी नहीं है। सन्तोषी माता दरअसल भारत के कुछ गांवों में पूजी जाने वाली ग्राम देवी थी जिनकी मान्यता रोगों के ...

#सनातन के विरुद्ध षड्यंत्र #बाबा_पकड़_ले_जायेगा_?

Image
  ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ बाबा शब्द को हमारे यँहा दो प्रकार से समझा जा सकता है। एक पिता के पिता और् एक सम्मानीय संत जिनका कर्तव्य है कि समाज में फैली बुराई आपने तप और् जप से दूर करे। #वैदिक काल में अंग्रेजो के आने से पहले तक साधू, संत, महात्मा, बाबा सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। गुरुकुल के समय यही साधू बाबा हमारे लिये वैज्ञानिक, शिक्षक और् पथप्रदर्शक के रूप में समाज को बहुत कुछ देकर गए। #आर्यभट्ट , वराहमिहिर, बोधायन, चरक, सुश्रुत, नागार्जुन, चाणक्य, कणाद जैसे सनातनी वैज्ञानिक संत साधू बाबा के रूप में ही रहते थे ना कि कंठ लगोट लगाते थे। इन्ही बाबाओं ने चिकित्सा, खगोल विज्ञान, धातुकर्म, भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणितीय पद्धति, अंतरिक्ष विज्ञान आदि में की गई खोज का आज एक विज्ञान दस प्रतिशत भी नही पा सका है। #आधुनिक विज्ञान अभी ध्वनि की तरंगों का क, ख, ग भी नही समझ पाया है जिसमे एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर ध्वनि तरंगों से बात करते थे। ऐसे ही बाबाओं की खोज से वैदिक विज्ञान का ज्ञान मिला। आधुनिक विज्ञान में मेडिटेशन अभी आरंभिक काल में है, जिसमे सशरीर आप किसी काल में आ जा सकते थे। #पर अंग्रेजो के...

कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्"

Image
  ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।   जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस अद्भुत रचना के रचने वाले श्री वेंकटाध्वरि का जन्म कांचीपुरम के एक गांव अरसनीपलै में हुआ था। इन्होंने कुल 14 रचनाएं लिखी हैं जिनमें से "राघवयादवीयम्" और "लक्ष्मीसहस्त्रम्" सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। वेंकटाध्वरि श्री वेदांत देशिक के शिष्य थे जिन्होंने इनको शास्त्रों की शिक्षा दी। वेदांत देशिक ने ही श्री रामनुजमाचार्य द्वारा स्थापित रामानुज सम्प्रदाय को वेडगलई गुट के द्वारा आगे बढ़ाया। बचपन में ही दृष्टि दोष से बाधित होने के बावजूद वे मेधावी वकुशाग्र बुद्धि के धनी थे। उन्होंने वेदान्त देशिक का, जिन्हें वेंकटनाथ (1269–1370) के नाम से भी जाना जाता है तथा जिनकी "पादुका सहस्रम्" नामक रचना चित्रकाव्य की अनुपम् भेंट है, अनुयायी बन काव्यशास्त्र में महारत हासिल ...